आयुर्वेद , बाबा रामदेव और भारतीय समाज –

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आयुर्वेद

आयुर्वेद , रामदेव और भारतीय समाज –

एक ओर जहाँ पूरी दुनिया के वैज्ञानिक कोविड-19 के लिए दवा खोजने और टिका बनाने के जदोजहद में लगे हुए है | , वही बाबा रामदेव भारत में अपनी चमत्कारी दवा कोरोलिन के साथ आ टपके ! तुर्रा ये कि कोविड -19 के इलाज़ में इसकी सफलता दर 70 , 80 या 90 % नहीं बल्कि पुरे 100 % है | मेडिसिन ( आयुर्वेदिक दवाओं समेत ) के इतिहास में शायद ही कोई और दवा 100 % सफलता की निश्चितता का दावा करती हो !बाबा जी ने ये घोषणाएं अपनी पूरी मंडली के साथ राष्ट्रीय टेली विज़न पर की और देश -दुनिया देखती रह गई|

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भारत की बात बाद में लेकिन इस नौटंकी की वजह से दुनिया के वैज्ञानिक विरादरी पर तब -तक हमारे देश की अच्छी -खासी किरकरी हो चुकी थी |बाबा रामदेव की इस घोषणा के बाद , उत्तराखंड सरकार ने कहा कि उसकी लाइसेंस देने वाली संस्था ने दिव्या फार्मेसी को ( पतंजली कि दावा इकाई ) किसी किस्म का अप्रूवल कोरोना किट के लिए नहीं दिया है | साथ ही साथ राजस्थान सरकार ने पतंजली द्वारा किसी किस्म के क्लीनिकल ट्रायल कि जानकारी के सम्बन्ध में अनभिज्ञयता जता दी |

रही सही कसर इस खबर ने पूरी कर दी की कोविड -19 के हल्के लक्षणों वाले मरीजों को भी ट्रायल के दौरान पतंजली की कोरोनिल से कोई आराम न होने पर उन्हें ऐलोपैथिक दवा देकर ठीक किया गया था | भाण्डा फुट चूका था , और भारत सरकार के आयुष विभाग ने भी रामदेव को नोटिस पकड़ा दी है | दो कदम और आगे आकर ड्रग अथॉरिटी ने ये राज भी खोल दिया कि रामदेव ने ‘कोरोनिल’ का लाइसेंस सर्दी -खासी -जुकाम के लिए ले रखा है |

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प्राचीन चिकित्सा पद्धति और आधुनिक चिकित्सा पद्धति –

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कहा जाता है आयुर्वेद दुनिया कि प्राचीनतम चिकित्सा पद्धतियों में से एक है | चिकित्सा संबधी प्राचीन ज्ञान को भारत में आयुर्वेद ने लिपिबद्ध , सुसंगत और सांस्थानिक रूप प्रदान किया है | अतीत के किसी भी ज्ञान के सामान आयुर्वेद का मानव समाज की बेहतरी के लिए अपना योगदान रहा है |यही कारण है कि रोग प्रतिरोधक क्षमता में अभिवृद्धि हो या सामान्य सर्दी -जुकाम हो या फिर मर्ज (बवासीर ) वैगरह , आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रयोग भारत में आज भी लोकप्रिय है |

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लेकिन इसी के साथ जैसे किसी भी प्राचीन ज्ञान परम्परा कि सीमा बनती है आयुर्वेद की भी अपनी एक सीमा है | आधुनिक काल का सच है | सर्जरी हो , टीकाकरण हो , हार्ट ट्रांसप्लांट हो , ये सब आधुनिक चिकित्सा पद्धति की देन है | जिनका कोई भी प्राचीन चिकित्सा पद्धति मुकाबला नहीं कर सकती है | इसी वजह से ” आयुर्वेदाचार्य ” ‘ बालकृष्ण ‘ की तबियत बिगड़ने पर उन्हें सीधे AIIMS की याद आ जाती है |

चिकित्सा पर पूंजीवाद व्यवस्था और बाज़ारवाद का प्रभाव  –

पूंजीवाद व्यवस्था और बाज़ारवाद की अतिशय लाभ निचोड़ने की हवस ने आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं को लगातार आम लोगों की पहुंच से बाहर किया है |इसी परिस्थति का फायदा झोला -छाप डॉक्टर , झाड़ -फूंक वाले और बाबा रामदेव जैसे लोग उठाते है |

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अपने उत्पाद को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त ( Competitive Edge ) देने के लिए ‘ पतंजली ‘ जैसे सस्थान ‘ एलोपैथी’ पर ही हल्ला -बोल देते है |जहाँ तक side effect का प्रश्न है तो हर प्रकार की औषधि ( दवा) ( आयुर्वेदिक समेत ) का थोड़ा या ज्यादा साइड इफ़ेक्ट होता है |
महंगी दवाये और उनके साइड इफ़ेक्ट का ही -हल्ला मचाकर ‘ पतंजली ‘जैसे उत्पाद एक ओर तो आम जनमानस को ‘ बाजार व्यवस्था ‘ के विरुद्ध खड़ा होने से रोककर आधुनिक चिकित्सा पद्धति के विरुद्ध कर देते है तो दूसरी ओर ऐसे झूठे दावे करने प्रारंभ कर देते है जैसा ‘आयुर्वेद’ ने कभी नहीं किया होता है |उदहारण के लिए जैसा की हाल के कोविड -19 के कोरोनिल मामले में हुआ है |

भारतीय समाज में प्राचीन ज्ञान के प्रति एक आशक्ति-

तार्किक और वैज्ञानिक टेम्परामेंट की कमी की वजह से भारतीय समाज में प्राचीन ज्ञान के प्रति एक आशक्ति सी रही है | दक्षिणपंथी राजनैतिक समूहों ( भाजपा , संघ परिवार ) ने अपने राजनैतिक हितों के लिए इस गैरवैज्ञानिक आशक्ति को बढ़ावा देने का काम किया है | ( प्राचीन भारत महान, मध्यकालीन गुलाम ) !

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यद्यपि की प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के आन्तर्य को समझना इतना भी दुरूह नहीं | उदहारण के लिए ‘ काढ़ा पीने से सर्दी -जुकाम में आराम मिलता है ‘, इसके पीछे के कारण की एक स्यूत व्याख्या तो आयुर्वेदचार्य कर सकते थे , किन्तु उन वैज्ञानिक रासायनिक प्रक्रियायों को व्यस्थित तौर पर व्याख्यादित नहीं कर सके जो काढ़े और कफ के बीच होती है |

आधुनिक विज्ञानं कार्य -कारण सम्बन्ध 

इस काम को करने में आधुनिक चिकित्सा पद्धति सफल रही है | कहने का अर्थ आधुनिक विज्ञानं कार्य -कारण सम्बन्ध स्थापित करता है | आधुनिक चिकित्सा पद्धति काढ़े और कफ के बीच की रासायनिक क्रिया की खोज करके कार्य -कारण सम्बन्ध दिखा देती है | प्राचीन ज्ञान प्राय अनुभवजनित जबकि आधुनिक विज्ञानं कार्य -कारण पे आधारित होता है |

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चूकी भारतीय समाज का पिछड़ापन व्यवस्था और हुकूमत करने वाले तबकों के लिए फायदेमंद होता है इसलिए व्यवस्था न केवल समाज के पिछड़ेपन के लिए उदासीन बनी रहती है वरन बाज मौकों पर इस प्रवित्ति को बढ़ाती भी है | कौन सा हुक्मरान तबका ये नहीं चाहेगा की लोग अपनी ग़ुरबत , बेरोजगारी , दवा बिना मौत का कारण व्यवस्था के वजाय अपने पूर्व जन्मो के कर्म और किस्मत में खोजे ?

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