आये जाने कुम्भ और उसके वैभव के बारे में -प्रयागराज में कुंभ मेला

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कुम्भ

आये जाने कुम्भ और उसके वैभव के बारे में -प्रयागराज में कुंभ मेला –

 

आधात्मिक देश है भारत इसलिए यहाँ पे समय -समय पे यज्ञ , पूजा और मेला आयोजित होते रहते है |कुम्भ उसमे बड़ा नाम है ये ६ वर्षो में और १२ वर्षो में मनाया जाता है | जो मेला ६ वर्ष में आता है उसे अर्ध कुम्भ कहते है और जो १२ साल में आता है उसे कुम्भ कहते है | ये अपने तरह का दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है | दिसंबर २०१७ में यूनिस्को ने इसे ‘ अमूर्त कल्चरल हेरिटेज ऑफ़ हुमिनिटी लिस्ट ‘ में शामिल किया तब से इसकी पहचान वैशिक रूप से हो गई है | और ये मेले के दुनिया के मंच पर खड़ा कर दिया | इसदिन शाही स्नान होते है और माना जाता है की इस दिन जो भी स्नान करेगा उसका पाप सब धूळ जायेगा | हिन्दू परम्परा में माना जाता है की सबका पुनर्जन्म होता है | यहाँ इस मेले में ये शाही स्नान करने से माना जाता है की आपकी सबकी मुक्ति हो जाती है | लोगों को परमात्मा का मिलन होता है |

कुम्भ मेले का आयोजन स्थल का चुनाव –pryagraj-कुम्भ

ये परम्परा बहुत पुराणी है | बहुत ही समय से चली आ रही है | कुम्भ का आयोजन हर जगह नहीं हो सकता -इसके लिए शास्त्रों के अनुसार विशेस स्थान तय किये है |ये चार स्थान नासिक में गोदावरी नदी के तट पे ,उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पे ,हरिद्वार में गंगा नदी के तट पे  और प्रयाग में संगम के तट पे | ये मेला प्रतेक १२ साल के अंतराल पे लगता है | इस आयोजन में ६ वर्ष के अंतराल पे ‘ अर्ध कुम्भ ‘ का आयोजन होता है |इस आयोजन का सही समय और तिथि ज्योतिःशास्त्र और धार्मिक के आधार पे होता है | ये ध्यान देने योग्य बात है की प्रयागराज ( इलाहाबाद ) संगम के तट पे प्रतेक वर्ष माघ मेला आयोजित किया जाता है और हर ६ साल पे ” अर्ध कुम्भ ” आयोजित होता है | ये मेला ६ वर्ष में होता है तो उसे ‘ अर्ध कुम्भ ‘ और १२ साल में आता है उसे ‘कुम्भ ‘ कहते है |

कुम्भ मेले का इतिहास –

कुम्भ मेले के महत्व बहुत ही नैसर्गिक है | ये हमे अच्छे कर्म करने के लिए उत्साहित करता है | हमे सत्य कर्म पे चलने के बारे में बताता है | कुम्भ – का अर्थ -” घड़ा” होता है | शास्त्रों में एक बार सभी देवताओं की शक्ति क्षीण हो गयी थी | अपनी देवीए शक्ति फिर से प्राप्त करने के देवता ने असुरों को समुन्दर मंथन के लिए राज़ी किया | समुन्द्र मंथन के उन्हें अमृत कलश प्राप्त हुआ | और बाद असुरों और देवतों में युध्य शुरू हो गया | ये युध्य १२ साल तक चला | उसी समय पक्षियों में गरुण इस अमृत कलश को लेकर उड़ गया | प्रथा ये है की अमृत का कलश से अमृत जहा -जहाँ छलका वही ये कुम्भ मेले के उत्सव की प्रथा बनी | और अंत में अमृत देवताओं को प्राप्त हुआ और वो अमर हो गये|कुम्भ-kumbh

ग्रहों की स्तिथि के अनुसार -कुम्भ मेले का आयोजन –

१-इस धार्मिक मेले को तीनो गृह -सूर्य ,चंद्र और बहस्पति के स्थिति के अनुसार अलग -अलग स्थानों पे मनाया जाता है | अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार ( जनवरी – फरवरी ) माघ के महीने में जिस दिन को बहस्पति मेष और विषभ राशि में हो और सूर्य -चंद्र कर्क राशि में हो उस दिन को ये मेला इलाहाबाद ( प्रयागराज ) में लगता है |

२-अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार ( मार्च -अप्रैल ) चैत्र के महीने में जिस दिन को बहस्पति कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में मौजूद हु | उस दिन ये मेला हरिद्वार में मनाया जाता है |

३-अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार (अप्रैल -मई ) वैशाख महीने के जिस दिन बहस्पति का स्थान सिंह राशि में और सूर्य मेष स्थान में स्थित हो  या तीनो ग्रह तुला राशि में स्थित हो उस दिन ये मेला उज्जैन में मनाया जाता है |

४-अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार (अगस्त -सितम्बर ) भाद्रपद महीने के दिन सूर्य और बहस्पति के सिंह राशि में प्रवेश करने पे ये मेला नाशिक में मनाया जाता है |

आगामी कुम्भ मेले का समय और स्थान –

अगले साल २०१९ में इलाहाबाद ( प्रयागराज ) में ” अर्ध कुम्भ ” मेले का आयोजन होने वाला है |इसकी तिथि १४ जनवरी से ४ मार्च तक की है | इसके ३ वर्ष बाद २०२२ में  हरिद्वार में इस मेले का आयोजन होगा |और वर्ष २०१५ में फिर से प्रयागराज (इलाहबाद ) में महाकुम्भ लगेगा |और २०२७ में नाशिक में कुम्भ मेले का आयोजन होगा |

कुम्भ मेले के शाही स्नान –

१५ जनवरी २०१९ – मकर संक्रन्ति( प्रथम शाही स्नान )

४ फरवरी २०१९ – मौनी अमावस्या ( दुतीय शाही स्नान )

10 फरवरी २०१९ -वसंत पंचमी ( तृतीय शाही स्नान )

४ मार्च २०१९ – महा शिवरात्रि ( चतुर्थ शाही स्नान )

आप सभी को हमारे तरफ से कुम्भ नगरी -प्रयागराज ( तीर्थराज ) में स्वागत है |

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