एक ऐसा अभिनेता जो दर्द को हास्य में पिरोता है – नाम -चार्ली चैप्लीन

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चार्ली चैप्लीन

एक ऐसा अभिनेता जो दर्द को हास्य में पिरोता है – नाम -चार्ली चैप्लीन

हम बात कर रहे एक बहुत ही उम्दा कलाकार का जिसके खून -खून में कला समायी हुई थी | जिसके कला की लोग आज भी नक़ल करते हुए दिखाए दे जाते है | जिसे स्पस्टवादी भी जाना जाता है | जो लोगों को हसाता भी था साथ ही साथ कुछ सिखाता भी था | एक ऐसा अभिनेता जो सब कुछ कह जाता था कभी -कभी बोलकर तो कभी बिना बोले | कहा जाता है की फिल्म -समाज का दर्पण होती है और कलाकार उसी समाज के चरित्रों को बड़े परदे पे उकेरता है | चार्ली चैप्लीन ने उस दायित्व को बहुत ही अच्छे से निभाया है | हमे उनके फिल्मो से आज भी बहुत कुछ सिखने को मिलता है | जर्मनी में जब हिटलर की तानाशाही थी जब सब लोग डरे हुए थे तब  चैप्लीन ही थे जो उनके डरों को मिटाकर उनके मन मस्तिष्क सूंदर कल्पना साकार करने निकल पड़ा था | उसने ही सिखाया की हास्य को खौफ के खिलाफ एक हथियार की तरह से कैसे इस्तमाल कर सकते है और इसी कारण ही उसके कई बार प्रतिबंद झेलने पड़े |

जन्म और जन्मस्थान –

चार्ली चैप्लीन का जन्म १६ अप्रैल १८८९ लंदन में हुआ था | इनकी माता का नाम हैना चैप्लीन और इनके पिता चार्ल्स स्पेंसर चैप्लीन था | ये दोनों लोग सीनियर म्यूजिक हाल गाते और अभिनय करते थे |पहले के ३ साल को छोड़कर चार्ली  चैप्लीन का जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण था | एक बार जब माँ स्टेज पे ना गा सकी तो लोग पत्थर फेकने लगे ऐसा देखकर मैनेजर ने ५ साल के चार्ली को स्टेज पे खड़ा कर दिया और यही चार्ली की मुलाकात रंगमंच से हुई | और उन्होंने अपने बिना लाग-लपट वाली भोली आवाज में माँ के गाने की नक़ल की -जिसे लोगों ने बहुत ही सराहा |स्टेज पे सिक्कों की बारिश होने लगी और यही चार्ली की पहली कमाई थी | और यही कारण था की उस बाल मन ने दुःख के कारण को हास्य में पिरो लिया था |नाम -चार्ली चैप्लीन

माता -पिता  से अलगाव –

माता -पिता के अलग हो जाने के बाद चार्ली चैप्लीन बहुत ही मुश्क़िलों के दौर से गुज़रना पड़ा -यहाँ तक उनको और उनके भाई और माँ को कुछ दिन अनाथयाले में भी गुज़ारने पड़े | माँ के पागल होने के बाद कोर्ट के आदेश के अनुसार चार्ली चैप्लीन अपने पिता चार्ल्स स्पेंसर के साथ रहना पड़ा जहा उनको अपने सौतेली माँ की प्रताड़ना भी सहना भी पड़ा | माँ जब ठीक होकर वापस आयी तो चार्ली के जीवन में फिर से खुशियां लौटने लगी |स्कूल जो बीच में छूट गया था वो फिर से शुरू हो गया लेकिन चार्ली का मन स्कूल में नहीं लगता था |
चार्ली चैप्लीन की अदाकारी –

चार्ली चैप्लीन की अदाकारी को बड़ा आकार जैक्सन से मिलने के बाद मिला | वो बड़े पारखी थे उन्हें रंगमंच की अच्छी समझ थी | उन्होंने चार्ली को एक नाटक में बूढ़े के किरदार में देखकर ही जान गये थे की इसमें बहुत क्षमता है | रोजगार मिलने से चार्ली चैप्लीन का जीवन थोड़ी -मोड़ी पटरी पे आ गयी | लेकिन अभी भी उनके जीवन संघर्ष कम हुए थे ख़तम नहीं और वो अपनी किस्मत आजमाते रहते थे क्योकि उनका अंतिम लक्ष्य अभिनेता बनना ही था | इसलिए ही वो रोज ही ब्लैक मोरे थेटर जाया करते थे | और रोज जाने से उनकी जान पहचान वहां के क्लर्क से हो गयी थी जिसने उनकी मुलाकात इ मिलटन से कराई |इसके बाद तो इनके जीवन के परिवर्तन ही हो गया | चार्ली  चैप्लीन को पढ़ना नहीं आता था | इसलिए उनको सवांद रटाये जाते थे | शरलॉक होम्स नाटक करके उन्होंने तो धूम मचा दिया था | लेकिन इसके बाद भी चार्ली का जीवन गर्दिश में ही गुज़रा | कुछ समय बाद इन्होने ने फोरेस्टर म्यूजिक हॉल में एक ट्रायल परफॉमेन्स की योजना बनायीं | फोरेस्टर के निराशा  के बाद भी करने कर्र्नु के ट्रायल शो ने चार्ली का हौसला बुलंद किया | धीरे -धीरे चार्ली की माली हालत सुधरने लगी थी और वो बहुत नाटक करने लगे थे और फिल्मो में भी काम करने लगे थे | ज़्यदातर उनके किरदार का नाम ट्रैप रहता था | जो उनका ही अतीत लगता था | जो अपनी मुफलिसी , और गरीबी से हास्य व्यंग चित्रित करता था | चार्ली चैप्लीन ने अपने संघर्षों से एक अलग ही मुकाम हासिल कर लिया और उसको सौन्दर्य बोध में घड़ने और हास्य व्यंग चित्रित करने में माहिर हो गए थे | और वो मेहनतकश आवाम के आवाज बनके उबरे थे | उनकी स्टेज पे या फिल्म में परफॉर्मन्स आम लोगों के कनेक्ट करती थी | चार्ली को अभिनय के अनोखी शैली विकसित करने के लिए जाना जाता रहेगा | चार्ली की पहली बोलती फिल्म थी -दी ग्रेट डिक्टेटर थी| चार्ली एक समय सभावों और मीटिंग्स में वामपंती पक्ष  लेते हुए दिखाई देते है | कई पत्रकार इन्हे रुसी एजेंट का भी आरोप मढे  | चार्ली के १० साल ऐसे भी रहे जब अमेरिकी सरकार और मीडिया उसके लिए आफत बने रहे है | चार्ली की फिल्म १९५२ में अमेरिका में रिलीज़ हुई लेकिन रिलीज़ के साथ ही बैन कर दी गयी |चार्ली चैप्लीन को अमेरिका बहुत लगाव था लेकिन अमेरिका का बुरा बर्ताव उन्हें अंदर से हिला दिया | चार्ली चैप्लीन अपनी ऊना के साथ छोड़कर अपने हम वतन लंदन आए गए लेकिन वहां सही जगह ना मिलने से वो स्विसजरलैंड रहने लगे यही उनकी मुलाकात इंद्रा गाँधी और नेहरू से हुई थी और उस समय नेहरू जी भारत के प्रधानमंत्री थे  | चार्ली चैप्लीन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है की वो गाँधी के राजनितिक स्पस्टवादिता सदा कायल रहे है |एक बार वो चर्चिल से गाँधी जी से मिलने की मन जताया था और सयोग की गाँधी जी उस समय लंदन में ही थे |  गाँधी जी उस समय लंदन के झोपड़ -पट्टी में डेरा डाले हुए थे और चार्ली और गाँधी की मुलाकात वही हुई और उन दोनों लोगों की राजनितिक विषय पे बहुत बातें हुई |चार्ली चैप्लीन ने उन्हें नैतिक समर्थन भी दिया |चार्ली चैप्लीन को अनेकों पुरस्कारों से सम्मांनित किया गया | उसमे से मुख्या १९२९ में अकादमिक मानक पुरस्कार जो सरकस के लिए दिया गया |१९४० में दी ग्रेट डिक्टेटर के सर्वोत्तम कलाकार का पुरस्कार दिया गया |१९५२ में सर्वोत्तम ओरिजिनल म्यूजिक लाइमलाइट के लिए दिया गया |१९७२ में लाइफटाइम आवार्ड अकादमिक पुरस्कार दिया गया | २५ दिसंबर १०७७ को स्विसजरलैंड में इनकी मौत हो गयी | जब सारी दुनिया २५ दिसंबर क्रिसमस का पर्व मना रही थी तब इस सख्स ने दुनिया को अलविदा कहा |उन्होंने कहा था की-

” मेरा दर्द किसी के हसने की वजह बन सकता है | पर मेरी हसी कभी भी किसी के दर्द की वजह नहीं होनी चाहिए “

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