एक ऐसा लेखक , शायर , जिसको जाना पड़ा अपनी लेखनी की वजह से कारागार(जेल ) – सआदत हसन मंटो

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सहादत हसन मंटो

एक ऐसा लेखक , शायर , जिसको जाना पड़ा अपनी लेखनी की वजह से कारागार(जेल ) – सआदत हसन मंटो

 

आज की पीढ़ी के लोग हो सके तो ये नाम कम ही सुना होगा -‘सहादत हसन मंटो ‘ और सोच रहे होंगे की ऐसा भी लेखक है जो बस अपनी लेखनी की वजह से कारागार ( जेल ) जा सकता है |जबकि पहले ना तो कोई सोशल मीडिया होता था और न तो वाट्सप जैसे ऐप न इतने प्रिंट मीडिया न इतने टीवी चैनल्स  और न इतने सोशल प्लेटफॉर्म | बस रही सही होती थी तो किताबे , अख़बार तो गौर करने वाली बात ये थी की ‘ सआदत हसन मंटो ‘ क्या लिखा होगा जो की उस समय के हुक्मरान को गलत लगी होगी | जो की उन्हें एक नहीं ६ बार जेल भेजते रहे है | क्या वो बातें थी या क्या वो अलफ़ाज़ थे जो आज़ादी से पहले वाले हुक्मरानो को भी ठीक नहीं लगी और आज़ादी के बाद वाले हुक्मरानो को भी नहीं |क्योकि हसन साहेब को आज़ादी के पहले ३ बार जेल जाना और जब वो अपनी पूरी परिवार के साथ बटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए | वहाँ भी उन्हें ३ बार जेल जाना पड़ा | कहा जाता है की इनकी लेखनी में आग थी सचाई थी जो भी समाज में घटा उसको हुबहु ही उतार देते थे |झूठा कोई भी लिबास पहनाने के चक्कर में नहीं पड़ते थे |

जन्म और जन्मस्थान –

सआदत हसन मंटो एक पाकिस्तानी लेखक है इनका जन्म आज़ादी से पहले भारत के  समराला , लुधियाना  पंजाब में ११ मई १९१२ में हुआ था | इनकी ज्यादातर लेखनी उर्दू ज़बान में थी | इन्होने २२ लघु कथाये लिखी | जो बहुत ही प्रसिद्ध हुई  कुछ जैसे तोबा टेक सिंह , ठंडा गोस्त रही है | उनकी कुछ कथाये बहुत ही प्रसिद्ध हुई जो खासकर बटवारे पे थी | उन्होंने एक नावेल , ५ काल के रेडियो प्ले , तीन निबंध लिखे | सआदत हसन मंटो समाज की कठिन सचाई को लिखने के लिए जाने जाते थे | जो कई बार उनपे बहुत ही भरी पड़ती थी | इन्हे २० सदी का सबसे बड़ा उर्दू लेखक माना जाता है | इनके पिता न्यायाधीश थे और ये लोग कश्मीरी थे | एक बार इनकी पंडित नेहरू से पत्र से पत्र- चार  हुआ तो इन्होने नेहरू जी परमार्श दिया की ‘ ब्यूटीफुल ‘ की सेकंड मीनिंग ‘कश्मीरी ‘ होनी चाहिए |सहादत हसन मंटो sahadat hasan manto

प्रारम्भिक जीवन –

इनके जीवन में करवट तब ली जब ये महज़ २१ साल के थे | और इनकी मुलाकात अब्दुल बरी अलग  से हुई जो की एक बहुत अच्छे लेखक थे | जिससे ये बहुत ही ज्यादा ही प्रभावित रहे | अब्दुल जी ने इन्हे बहुत ही प्रोत्साहित किया की ये अपने सच्ची प्रतिभा को पहचाने | और बहुत पढ़े | और हर तरह का किताबे  पढ़े – और हर भाषा की किताबी पढ़े – रशियन और फ्रेंच लेखकों को पढ़े | इन्होने अपनी स्नातक की पढ़ाई अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी  से फरवरी १९३४ में की | अलीगढ में ये लेखकों के एसोसिएशन में शामिल हो गये| अलीगढ में इन्हे सरदार अली जाफरी से मुलाकात हुई और इनके लेखनी पैनापन आ गया | और इनकी दूसरी कहानी -‘ इंक़लाब पसंद ” अलीगढ मैगज़ीन में  मार्च १९३५ में प्रकाशित हुई | सआदत हसन मंटो ने १९४१ में आल इंडिया रेडियो में जॉब पकड़ ली | वो आल इंडिया रेडियो के लिए उर्दू में लिखा करते थे | यही वो समय था जब मंटो बहुत ही ज़्यदा लिख पढ़ रहे थे और ज्यादा पोएट्री , निबंध , कहानिया इसी समय आये | और इस समय उन्होंने ५ रेडियो प्ले लिखे | उन्होंने अपना लेखन जारी रखा और लघु कथाये लिखने लगे | उनका एक संग्रह भी बनाया – जिसका नाम उन्होंने ‘धुआँ’ रखा | उसके बाद’ मंटो का अफसाना ‘ आया | आल इंडिया रेडिओ के डायरेक्टर से झगड़ा होने के बाद उन्होंने आल इंडिया रेडियो की जॉब छोड़ दी | जॉब छोड़ने, के बाद जुलाई में ये बॉम्बे आ गए औरफिल्मइंडस्ट्रीज में काम करने लगे   | बहुत सी फिल्मे की स्क्रीन राइटिंग की शिकारी, चल -चल रे नवजवान , मिर्जा ग़ालिब जो की १९५४ में रिलीज़ हुई | ये मुंबई में तब तक रहे जब तक बटवारे के बाद पाकिस्तान नहीं चले गये |  जब ये भारत से पाकिस्तान गये तो वो पाकिस्तान के लाहौर  सहर में रह रहे थे और लाहौर के सभी लेखक के संघ में सम्लित हो गये | उसमे फैज़ अहमद फैज़ ,नाशिर काज़मी ,अहमद रही , थे | ये लोग पाक टी हाउस में इकठा होते थे और तीखी बहस किया करते थे अपनी हर मसले पे बेबाक राय रखते थे |

मृत्यु  –

इनकी मृत्यु १८ जनवरी १९५५ में लाहौर के अप्पार्टमेन्ट में हुई | इनकी मृत्यु में शराब के बहुत हाथ था | इनके पत्नी साफिआ  और तीन लड़कियां  निघत ,नुजहत ,नुसरत को अपने पीछे छोड़ गये|  और पाकिस्तान गोवेर्मेंट ने इनका नाम का स्टम्प  २००५ में जारी किया | १४ अगस्त २०१२ को पकिस्तान गोवेर्मेंट ने इन्हे निशान -ऐ -इम्तिआज़ से नवाजा गया है | इनपे जल्दी ही नंदिता दास के दवरा “मंटो ” एक फिल्म भी आ गयी है | जिसमे नवाजद्दीन सिद्द्की  मंटो को किरदार निभा रहे है |

” अगर आप इन अफ़साने को बर्दाश नहीं कर सकते तो ये ज़माना नाक़ाबिल -ऐ बर्दाश्त है ”

‘ सआदत हसन मंटो ‘

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