औरत क्या केवल उपभोग की वस्तु है ?/Is the woman the only thing to be consumed?

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औरत क्या केवल उपभोग की वस्तु है ?

उपभोग

औरत को समाज का दबा कुचला माना जाता है| क्योकि हमारा समाज पृतात्मक समाज है | इसका एक उदहारण ये है की यहाँ बच्चे अपने बाप या पिता के नाम से जाने जाते है | उनके मार्कशीट पे उनके डिग्री पे पिता के नाम की ही प्रमुखता दी जाती है | जल्दी ही कुछ बदलाव हुए है और माता के नाम को भी एप्लीकेशन फॉर्म और जगह पे स्थान दिया जा रहा है | हमारे सविंधान में भी समानता की अधिकार एक मौलिक अधिकार है | लेकिन क्या हम महिलाओं को ये दे पा रहे है | क्या हमने अपनी मानसिकता बदली है | क्या समाज को अभी भी ये लगता है की घर के सब बड़े फैसले पुरष ही लेते है |बड़े -बड़े अख़बार या मीडिया चैनल या बड़ी कम्पनिया खुद से न्याय करती हुई दिखाई देती है | कंपनी जो ब्यूटी प्रोडक्ट बनाती है | क्या वो महिलाओं को महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल नहीं कर रही है | इसमें हमारी कंपनी और बहुराष्ट्रीय कंपनी भी शामिल है | सुंदरता का पैयमाना वो तय करती हुई दिखाई देती है और पुरे भारत को गोरा बनाने में लगी है और दिखाती है अपने  प्रचार में की आप गोरे नहीं तो सोसाइटी में सही नहीं लगोगे आपकी शादी में दिक्कत हो सकती है और हमारी कंपनी का क्रीम यूज़ आप तुरंत या ७ दिन गोरे हो जायेंगे |ये क्या एक भेदभाव का रूप नहीं| महिलाओं के मन में जानबूझकर ये ख्याल डालना केवल अपने निजी स्वार्थ के लिए | रक्षा बंधन के ऐड में भाई को हमेशा सुरक्षा करते हुए या वचन देते हुए दिखाना क्या ये सब असामनता को नहीं दिखता | क्योकि हम किसी की रक्षा का क्यों करेंगे क्यों ना उसको हम इस लायक बनाये की वो हमारी रक्षा करे -क्यों न हम उसे सुन्दर बनने को प्रेरित न करके अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा दे | कभी -कभी हम भेदभाव जानभूझकर नहीं करते हो जाता है | क्योकि हम जो भी पड़ते है या देखते है जहा काम करते है वहाँ ये मौजूद है | महिलाओं की रेस्पेक्ट करना चाहिए   सब ऐसे ही कहते है लिखते भी है वो देवी होती है उन्हें पूजना चाहिए सबका कहना होता है | ये कथन या ये भाव ही एक बराबरी का सोच नहीं दर्शाता क्योकि हम क्यों न उन्हें इस क़ाबिल बनाये या समझे की हमे ये गैर बराबरी शब्द न यूज़  करना पड़े | और मांगने से अक्सर भीख मिलती हैसम्मान नहीं  | वो इसको छीन लेंगी वो इस क़ाबिल है |उन्होंने वो हर जगह पुरषों से कन्धा मिलकर चल रही है | हमे अपनी सोच बदलनी होगी | बाजार के नियम और कायदे ही बज़ारी होते है | वो आपके अंदर -आपके सोच के साथ खेलते है | वो रक्षाबंधन पे अपना प्रोडक्ट बेच देंगे और आप से बस केवल इस दिन ही रक्षा करो और इस वर्ड से वो महिलाओं को दीनहीन दिखा देंगे | और तो और वो प्यार का भी एक पर्व बना देंगे – और आपसे कहेंगे  की केवल इन १० दिनों में तुम प्यार करो और दिन चाहे मारो -पीटों | क्योकि ये एक कला है अपने सामान को बेचने की | उन्होंने महिलओं को केवल एक प्रोडक्ट बनाके बेचना चाहा है | क्योकि अब दौर बदल चूका है हमे और कम्पनीज को और उस इंसान को बदलना चाहिए या बदलना ही पड़ेगा | बदलाव पहनावों से ही नहीं सोच से भी आता है | और जहाँ भी आपको गैरज़िम्मेदारन प्रचार या महिलाविरोधी गतिविधिया हो रही हो उसका जोरदार विरोध करना शुरू करिये |aurat3women

सोच बदलेगा तो सब बदलेगा

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