किताबें :जिन्हे जरूर पढ़ा जाना चाहिए (‘क्युकी बेहतर जिंदगी का रास्ता बेहतर किताबों से होकर जाता है’ ) – स्कूल

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किताबें :जिन्हे जरूर पढ़ा जाना चाहिए स्कूल

 

नर्सरी -किंडरगार्डन स्कूल और प्राथमिक शिक्षा कैसी हो?

इसपर पूरी दुनिया में बहस चलती रहती है.प्राथमिक शिक्षा के आधार स्तर पर,कुछ महान शिक्षकों ने महत्वपूर्ण प्रयोग भी किये  हैं, जिन्हे शिक्षा के साथ साथ बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ रही है.प्राथमिक शिक्षा में ऐसे ही एक अनूठे प्रयोग की ख़ूबसूरत दास्ताँ है तो तो -चान.इसकी लेखिका का नाम है ‘टेटसिको कुरोयांगी . तो तो -चान और कोई नहीं बचपन की कुरोयांगी ही हैं. इसमें कहानी है एक स्कूल की , एक ऐसा स्कूल जो बच्चों के लिए कल्पना लोक  से कम नहीं .ऐसा स्कूल, जहाँ बंधे बँधाये पीरियड्स नहीं,कोई स्कूल की यूनिफार्म नहीं,न टीचर का डंडा न कोई सजा,और तो और बच्चों के खेल भी निराले.और मजे की बात ये की स्कूल की कोई बिल्डिंग भी नहीं?

बिना बिल्डिंग के स्कूल कैसा?

है न अचरज की बात.स्कूल ‘एक बगीचे में रखे रेल के डब्बों से बना है जिसका मुख्या  गेट दो पेड़ो से बना है. बगीचा खेल का मैदान और रेल के डिब्बे क्लासरूम .जब मन्न चाहे और जो मन्न चाहे पढ़ो और न मन्न हो तो खेलो.किसी विषय में परेशानी होने पर मदद के लिए टीचर तो हैं ही. कोई बंधा पीरियड नहीं ,खाने की घंटी को छोड़कर .सुबह मन्न हो तो मैथ लगाओ या आर्ट बनाओ या फिर खेलो कोई मनाही नहीं

स्कूल books allgyan

ये कल्पनाओ का स्कूल नहीं है आज से ८० वर्ष पहले जापान में ऐसा ही स्कूल हुआ करता था.ये टोमोय स्कूल था जिसे आचार्य श्री कोबायाशी ने बनाया था.कोबायाशी बच्चों से कहा करते थे “तुम सब एक हो, पता है न तुम्हे,तुम कुछ भी करो,इस दुनिया में तुम सब एक साथ हो”.जातियों ,सम्प्रदायों और छोटे ,बड़े के भेद भाव से ग्रस्त हमारे  समाज के लिए ये बात एक नज़ीर हो सकती है.खैर, इसी टोमोय स्कूल की कहानी है’ तो तो चान ‘जिसकी लेखिका इस स्कूल की छात्र रही हैं.इस किताब का दुनिया की लगभग सारी भाषाओं में अनुवाद हो चूका है और ८ वर्षों तक ये किताब जापान में बेस्ट सेलर रही है.लेखिका जापान की सबसे बड़ी प्रस्तोता भी रही हैं और उनके शब्दों में “अगर टोमोय स्कूल नहीं होता तो उनकी ज़िन्दगी में ये सब कुछ नहीं होता”

सारे तथाकथित ‘सामान्य’ स्कूलों ने जिस लड़की को पढ़ाने से मना कर दिया, और तो और ,माँ को बताया गया की आपकी बेटी पढ़ने के काबिल ही नहीं है, उसे टोमोय स्कूल ने हाथों हाथ लिया.क्या विडंबना है, सामान्य स्कूलों की नजर में जो पढ़ने के काबिल नहीं थी वो ‘तोतो चान’ की लेखिका और सबसे बड़ी प्रस्तोता बनी.

तीसरे’ सामान्य  स्कूल’ से निकाले जाने के बाद जब तो तो चान अपनी माँ से पूछती है की “अब वो  इस स्कूल में क्यों नहीं पड़ेगी?तो माँ जवाब देती है की” बेटा ये स्कूल तुम्हारे लायक नहीं है”.इस घटना के लिए तोतो चान का कहना है की माँ उस वक़्त मेरे भविस्य को लेकर बहुत परेशान रही होंगी तब भी उन्होंने मेरे मनोबल को न कम होने दिया न ही झुंझुलाई .

अंत में थक हार के माँ टोमोय स्कूल का रुख करती हैं. स्कूल को देखकर ही तोत्तोचान को बहुत ाचा  लगता है .स्कूल में प्रवेश का तरीका भी बिलकुल  अलहदा है,जिसमे कोबायाशी बच्चों से बातचीत करने के बाद उन्हें स्कूल में प्रवेश देतें हैं. माजे की बात तो ये है की ७ साल की तोतो चान उनसे चार घंटों तक बिना रुके बातचीत कर लेती है.वो भी जिज्ञासा और धैर्य के साथ उसकी बातें सुनते हैं. सबकुछ सुनने के बाद उससे पूछते हैं ‘और कुछ’ और तोतो चान के पास बात करने के लिए कुछ नहीं बचता और वो न में सर हिला देती है.ऐसा उसके साथ पहली बार हुआ था की सुनने वाला सामने बैठा हो और तोत्तोचान के पास सुनाने के लिए कुछ न हो .अंत में कोबायाशी कहते है की “अब तुम इस स्कूल की छात्र हो”.और ये शब्द चान के लिए सारी जिंदगी न भूलने वाले शब्द बन जातें हैं

स्कूल allgyan                                            एक बात और, कोबायाशी अक्सर ही तोत्तोचान से कहा करते थे की ,”तुम सच में एक अच्छी लड़की हो”.चाहे बड़ो की नजर में उस वक़्त वो कोई सररत ही क्यों न कर रही हो.

टोमोय स्कूल द्वितीय विश्वयुद्ध में हुई बमबारी में नस्ट हो गया था.और अपने जलते हुए स्कूल को देखकर कोबायाशी ने अपने साथ खड़े सहयोगी से कहा की ,”अब हम कैसा स्कूल बनाएंगे”. हालाँकि टोमोय स्कूल दुबारा कभी न खड़ा हो सका लेकि आचार्यश्री का असवाद गजब का था.

अंत में , इस पुस्तक में हमें ८० वर्ष पूर्व के तत्कालीन जापानी समाज की झलक भी मिलती है. अपने मुल्क की बच्चियों की असुरक्षा को देखकर बड़ा अजीब लगता है, की कैसे, एक ७ वर्ष की बची’ अकेले बड़े आराम से ट्रैन का टिकट कटाकर हर रोज़ टोमोय स्कूल पढ़ने चली जाया करती थी.

 

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