कोरोना त्रासदी : प्राकृतिक या व्यवस्था जन्म

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कोरोना त्रासदी

कोरोना त्रासदी : प्राकृतिक या व्यवस्था जन्म –

पूरी दुनिया को आज कोरोना त्रासदी (महामारी) ने हिला के रख दिया है |या यूँ कहे कि बंद ही कर दिया है |अभी तक कि स्थति में लाख के ऊपर के लोगों कि जान जाने की और दसियों लाख लाख संक्रमित होने की जानकारी है | मौतों और संक्रमितों का सिलसिला कहा तक रुकेगा अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है |वायरस संक्रमण को रोकने के लिए लॉकडाउन की व्यवस्था ने जहॉ संक्रमण की रफ़्तार को कम किया है |वही दूसरी तरफ आम नागरिकों को दूसरी ही समस्या में उलझा दिया है |

कोरोना त्रासदी

इस महामारी को अलग -अलग सम्बोधन से नवाजा जा रहा है |कोई इसे वैश्विक महामारी का नाम दे रहा है तो कोईइसे प्राकतिक आपदा कह रहा है |तो कई इसे इंसानो की प्रकृति के साथ की गई छेड-छाड़ का नतीजा करार दे रहा है |लेकिन उपरोक्त किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हमे ये जांचने की कोशिश जरूर करनी चाहिए कि वर्तमान में कोरोना संक्रमण को कोरोना संकट या ‘ प्राकृतिक आपदा ‘ घोषित करना कही पूरी की पूरी राज्यव्यवस्था को ( दुनिया की ) आरोपित होने से बचाना तो नहीं है | इस सचाई को जानने समझने के लिए हमे कुछ तथ्यों पर अवश्य ही विचार करना चाहिए |

ये सच है की कोरोना वायरस तेज़ी से फैलने वाला वायरस है और इसकी संक्रमण दर बहुत तीव्र है | लेकिन इसके साथ ही साथ एक बात राहत पहुंचाने वाली है और वो है इस वायरस संक्रमितों में मृत्यु की दर जो ४० वर्ष से कम उम्र वाले लोगों में मात्र ०.४%है | चिंताजनक तथ्य है ६५ वर्ष के ऊपर के लोगों के लिए इसका जानलेवा होना |हालांकि ये ०.४% भले नगण्य लगे किन्तु भारी संख्या में संक्रमण की स्तिथि में लाखों लोग मर सकते है | जैसे यदि १० करोड़ ४० वर्ष से कम लोग संक्रमित हो तो उनमे से ४ लाख लोग के मरने की संभावना होगी | कुल मिलाकर मानवता आज एक गंभीर संकट के सामने खड़ी है |
चहुओर ये बातें हो रही है की देश , धर्म के भेद को मिटाकर पूरी मानव सभ्यता इस कोरोना संकट के सामने एकजुट है | हो सकता है , एक हद तक , ये बात सही भी हो लेकिन कुछ मौजूं सवाल करने के लिए हमे कुछ तथ्यों की और भी झाकना पड़ेगा |कोरोना त्रासदी (3)

 

रक्षा खर्च बनिस्पत स्वास्थ के मद में व्यय –

Stockholm international peace research institute ( sipri ) के अनुसार दुनिया के ज्यादातर बड़े विकसित देश और साथ ही साथ गरीब विकासशील देश भी अपने जीडीपी ( GDP ) बड़ा हिस्सा स्वास्थ सेवाओं के बदले रक्षा पे खर्च करते है | उदहारण के लिए सयुंक्त राज्य अमेरका ( USA ) जहॉ ३.२% रक्षा पर और १४. ३% स्वास्थ पर खर्च करता है वही भारत जैसा गरीब मुल्क २.४% रक्षा पर और १.२८ % स्वास्थ पर करता है |कोरोना त्रासदी (2)

कुल मिलाकर ये समझा जा सकता है की दुनिया भर के हुक्मरान रक्षा के नाम पर मानव दुश्मन हथियारों पर भारी मात्रा में खर्च कर रहे है | sipri के अनुसार पिछले वर्ष में ये खर्च बढ़ते ही जा रहे है | उदाहरण के लिए दुनिया भर के हुक्मरानो ने २०१७ की अपेक्षा २०१८ में ३ % ज्यादा हथियारों पे खर्च बढ़ाया है | योरोप और दूसरे विकसित मुल्क जो की ज्यादा परिपक़्व माने जाते है वहाँ जान दबाव के कारण हुक्मरानो को स्वास्थ सुविधाएं बेहतर बनायीं रखनी पड़ती है |

स्वास्थ सेवाओं का बाजार –

दवाइयाँ और स्वास्थ संबधी सेवाएं आज की बाजार संचालित दुनिया में अति लाभ का क्षेत्र है | यहाँ इंसानी मज़बूरी का लाभ उठाकर भारी मुनाफा कमाया जा सकता है |अपने देश भारत में का ही उदहारण ले तो कुकुरमुत्ते की तरह खुले निजि अस्पताल और नर्सिंग होम लाभ कमाने का ही माध्यम है , और इसमें बड़े निजि अस्पताल भी पीछे नहीं | निष्कर्ष ये है की जितना जेब में पैसा हो उतनी स्वास्थ सुविधाओं का एक व्यक्ति इस्तेमाल करे न हो तो मरे | क्या ये आश्चर्य नहीं कि इस कोरोना महामारी में कोरोना टेस्टिंग का भी ये निजि लैब ५००० रूपए ले रही है | आज भी टूटे -फूटे , पस्त पड़े सार्वजनिक अस्पताल ही देश की गरीब मेहनतकश जनता का सहारा बने हुए है |

कोरोना त्रासदी (2)

क्या स्वास्थ सुविधाओं के स्तर और कोरोना महामारी से लड़ने की रणनिति में संबंध है –

सैद्धांतिक रूप से स्वास्थ और शिक्षा सम्पूर्ण मानव समाज के हितार्थ होनी चाहिए न की मुनाफे और बाजार के लिए सुनहरा अवसर | हमारे अपने देश के राज्य केरल ने अपनी स्वास्थ सुविधाओं के दम पर ही कोरोना संक्रमण को प्रभावी तरीके से रोका है | बाकी जिन विकसित देशों ( सयुक्त राज्य अमेरिका ,इटली वैगरह) को कोरोना ने घुटने के बल ला खड़ा किया है उनके संदर्भ में हमे ये नहीं भूलना चाहिए की भारत जैसे देश से भले ही उनकी स्वास्थ सुविधाएं बेहतर हो लेकिन पर्याप्त है ऐसा नहीं कहा जा सकता है |बाजार की शक्तियां इन देशों में भी काम करती है और चिकित्सा सुविधाएं यहाँ बहुत महंगी है | अमेरिका में तो प्रति हजार लोगों पर डॉक्टर्स की संख्या भी २० ( बीस) है जो कही से पर्याप्त नहीं कही जा सकती |
भारत में अगर जन स्वास्थ सेवाएं बेहतरीन होती और बाजार उसे संचालित न कर रहा होता तो लाखों , करोड़ों लोगों की रोजी रोटी भी न जाती और हम कोरोना महामारी से बेहतर तरीके से जूझ भी लेते |

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