कोरोना महामारी और भारतीय समाज –

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कोरोना महामारी

कोरोना महामारी और भारतीय समाज –

किसी भी प्रकार की महामारी के दौर में ये देखा गया है की हमारे दबे , छिपे हुए सामाजिक पूर्वाग्रह सतह पर आ जाता है | चुकी भारतीय समाज कई सारे संस्तरों और बिभाजनों से घटा हुआ समाज है इसलिए हमारे समाज में पूर्वाग्रह के भी कई रूप है | वर्गीय पूर्वाग्रह , जातीय पूर्वाग्रह , धार्मिक पूर्वाग्रह , क्षेत्रीय पूर्वाग्रह वगैरह इनके कुछ रूप है |
चीन के वुवान में जन्म लेने वाली ये महामारी आज पूरी दुनिया में फ़ैल रही है | भारत में भी इस महामारी का आगमन प्रवासी भारतियों से हुआ है | सवाल इस बात का नहीं है की कौन इस बीमारी का वाहक बना ये तो इत्तेफाक की बात हो सकती है किन्तु प्रश्न ये है की भारत के भीतर जिस तरह प्रवासी मजदूरों को इसका मुख्या -वाहक अब समझा जा रहा है |वो एक समाज के तौर पर हमारे सामाजिक व्यवहार पर सवालिया निशान तो लगाता ही है |
सामाजिक वहिष्कार करना , छुआछूत या वैगरह इससे भी हमारा समाज भली भांति परिचित है | लोगों का कोरांटीन के बाद भी या निगेटिव रिपोर्ट के बाद भी दुरी बनाके रखना इसी सोच को दर्शाता है | इसका दूसरा पहलु लोगों का कोरोना संक्रमण के लक्षण के प्रकट होने के बाद भी उसको छिपाना है | वैज्ञानिक सोच विचार की कमी और जागरूकता की कमी लोगों को इस नहज़ पर ला खड़ा करती है | मजे ( त्रिमाही ) को छिपाना ( शारीरिक , सामाजिक ) और उसपे सफ़ेद पर्दा डालना ये हमारा व्यक्तिगत और सामाजिक अप्प्रोच रहा है |
लोग क्या कहेंगे ? क्या सोचेंगे ? बदनामी होगी वैगरह हमारी सामाजिक वय्हार को नियंत्रित करते है | इसी वजह से प्रशासन पर कोरोना संक्रमितों की पहचान करने का अतिरिक्त दबाव पड जाता है |
जमात के मामले में सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और धार्मिक पोंगापंती ने हमे खूब नुकसान पहुंचाया | जमातियों ने अपने रवैये से की हमे ये ववा नहीं लगेगी , लग भी गयी तो पाक काम की वजह से हम ठीक हो जायेंगे , नहीं ठीक हुए तो मस्जिद से पाक जगह मरने की कहा है | वैगरह ने , मुस्सल्मानो के प्रति सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को बढ़ाने में आग में घी का ही काम वयवस्था और पूरी सामाजिक बनावट के वजाय अपने आस -पास के सगे सम्बधियों को दोषी ठहराना भी हमारा एक सामाजिक वय्हार है | घरेलु हिंसा की बढ़ती हुई रिपोटों इस बात का खुलासा करती है | कई परिवार में तो बच्चे और महिलाओं की आफत ही आयी हुई है | क्रोधों की अग्नि वैसे भी आश्रितों और कमजोरों की प्रताड़ना से ही शांत होती है |
सकरात्मक प्रभाव भी कुछ कम नहीं है | समाज ने एक होकर इस महामारी का अब तक मुकाबला किया है | छिटमूट घटनावो को छोड़ दे तो स्वास्थकर्मी का साथ भी खूब दिया है | नागरिक समाज और आम लोग राशन की वयस्था करने से लेकर किसी भी किस्म के सहयोग के लिए तत्तपर रहे है पैदल अपने घरों को जा रहे मजदूरों की खाने – पिने की व्यवस्था भी गांव के लोगों ने की |

प्रश्न अब व्यवस्था पर है | समाज तो अपनी कमियों -खामियों और शक्ति के साथ इस माहमारी से जूझ ही रहा है | देखते है ये व्यवस्था उसे कितना भरोसा और विश्वास दे पाती है|

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