क्या मैटर करता है टॉयलेट पे कैसे बैठा जाये –

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टॉयलेट

क्या मैटर करता है टॉयलेट पे कैसे बैठा जाये –

लोगों का कहना होगा कोई जरुरी नहीं है | लेकिन काफी हद तक आपकी जीवन शैली आपके स्वास्थ पे प्रभाव डालती है | जिस प्रकार हम क्या खाते क्या नहीं खाते ये इसपे ध्यान देते है | जिस प्रकार खाना खाने एक महत्वपूर्ण कार्य है उसी तरह उसे निकालना भी उतना ही महत्वपूर्ण है | लोगों ये बात हो सके तो हास्य पद लग सकता है | लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण है | इसके लिए हमे अपने शरीर के बारे में जानने की आवश्यकता है |आपको जानना चाहिए की कोई भी  औसत व्यक्ति अपनी पूरी जिंदगी में ६ महीने टॉयलेट में बिताता है |और हर साल १४५ किलो मल त्याग करता है इसका मतलब अपने शरीर के भार से दुगना मल त्याग करता है एक साल में | अब आप समझ सकते ये कितना महत्वपूर्ण है हमारे लिए |

इंडियन स्टाइल के टॉयलेट के फायदे –

सबसे पहले हम बात करेंगे अफ्रीका के २० वी सदी के मध्य में यूरोपी डॉक्टरों की एक टीम अफ्रीका के गावों में काम कर उन्होंने पाया की वहाँ के लोगों में पेट से सम्बंधित बीमारिया ना के बराबर थी | विश्य के और कई विकासशील देशों में ये पाया गया |डॉक्टरों ने पता लगाया कि ये सिर्फ़ खाने में अंतर की वजह से नहीं था बल्कि लोगों के टॉयलेट इस्तेमाल करने के तरीक़े और मल त्याग करते समय बैठने की पोज़िशन में अंतर की वजह से भी था|

पश्चिमी देशों में लोग जितनी बार टॉयलेट में जाते हैं, औसतन वो वहां 114-130 सेकेंड बिताते हैं. इसके उलट, भारत समेत कई विकासशील देशों में लोग टॉयलेट में उकड़ूं होकर मल त्याग करते हैं और महज़ 51 सेकेंड में निबट लेते हैं|विकासशील देशों के शौचालयों का डिज़ाइन भी ऐसा होता है कि उसे इस्तेमाल करने के लिए आपको उकड़ूं बैठना होता है|विशेषज्ञों का मानना है कि उकड़ूं बैठने वाला तरीक़ा बेहतर है|

जब हम टॉयलेट सीट पर बैठते हैं तो हमारी ‘गुदा नलिका’ 90 अंश के कोण पर होती है इस वजह से हमारी मांसपेशियों में खिंचाव होता है| यही वजह है कि हममें से कई लोग टॉयलेट में बैठने पर तनाव महसूस करते हैं|

सबसे पहले फ्लश वाला टॉयलेट कब प्रयोग हुआ –

पहला फ़्लश वाला टॉयलेट साल 1592 में ब्रिटेन के जॉन हैरिंगटन ने बनाया था| उन्होंने इसे ‘द एजैक्स’ का नाम दिया था|इसके बाद वर्ष 1880 में थॉमस क्रैपर ने ‘यू-बेंड’ का आविष्कार किया और इस आविष्कार के साथ बहुत कुछ बदल गया|यू-बेंड’ सीधे टॉयलेट के नीचे से मल निकाल देता था और इससे बदबू नहीं आती थी|इस तरह पाश्चात्य शैली के टॉयलेट यूरोपीय सभ्यता का प्रतीक बन गए लेकिन इससे कुछ चीज़ेंमुश्किल भी हो गईं|

यूरोपीयन शैली के टॉयलेट  में कई तरह की समस्या आती है जैसे कब्ज , बदहजमी , अपच ये सब होता है |1960 के मध्य में कोर्नेल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एलेक्ज़ेंडर किरा ने यूरोपीय शैली के टॉयलेट्स को ‘सबसे बुरी डिज़ाइन’ में बनाई गई चीज़ कहा था |

इन सब का हल ये है की या तो आप इंडियन स्टाइल के टॉयलेट का इस्तेमाल करे या फिर अगर आप यूरोपीयन शैली के टॉयलेट प्रयोग करने आदी हो चुके है तो आप बस ये कर सकते है |अपने घुटनों को 90 डिग्री के बजाय 35 डिग्री कोण पर मोड़ लीजिए| जिससे आपके पेट और गुदा पर ज़ोर कम पड़ेगा और चीज़ें आसान हो जाएंगी|

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