घडी और उसका इतिहास –

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घडी (5)

घडी और समय-

घडी को बोलते लोग समझ जाते है की समय की बात कर रहे है | लेकिन हमे पता होना चाहिए जब इस दुनिया में रह रहे है तो हमे यहाँ बैठे ही दुनिया के किसी कोनो का टाइम पता चल जाता है क्या ये उतना सरल होगा जब लोगों के पास घडी न होगी या समय देखने का यंत्र न होगा |समय पर तो पूरा पृत्वी ही टिकी है |कब कौन जन्मा और कब कौन मरा इसका भी क्या हमे ज्ञान था |समय जितना महत्वपूर्ण है उतना ही घडी की भी महत्ता होगी |इसलिए मेरे मन में विचार आया की क्यों न आज उस समय को घडी के साथ देखते है जिस घडी में हम समय देखते थे उसमे उसका भी इतिहास देखते है |की पहली घडी कब बनी और इसके पीछे का इतिहास क्या था और जब घडिया नहीं थी तो लोग टाइम का कैसे अंदाज़ा लगाते थे | और आज के दौर में घडिया कितनी बदल गयी है |

घडी (2)प्राचीन काल में धूप घडी और जल घडी प्रचलित थी –

प्राचीन काल में धूप के कारण पड़नेवाली किसी वृक्ष अथवा अन्य स्थिर वस्तु की छाया के द्वारा समय का अनुमान किया जाता था। ऐसी धूपधड़ियों का प्रचलन अत्यंत प्राचीन काल से होता आ रहा है जिनमें आकाश में सूर्य के भ्रमण के कारण किसी पत्थर या लोहे के स्थिर टुकड़े की परछाई की गति में होनेवाले परिवर्तन के द्वारा “घड़ी” या “प्रहर” का अनुमान किया जाता था। बदली के दिनों में, अथवा रात में, समय जानने के लिय जल घड़ी का आविष्कार चीन के लोगों ने लगभग तीन हजार वर्ष पहले किया था। कालांतर में यह विधि मिस्रियों, यूनानियों एवं रोमनों को भी ज्ञात हुई।

घडी (6)जल घडी कैसे काम करती थी –

जलघड़ी में दो पात्रों का प्रयोग होता था। एक पात्र में पानी भर दिया जाता या और उसकी तली में छेद कर दिया जाता था। उसमें से थोड़ा थोड़ा जल नियंत्रित बूँदों के रूप में नीचे रखे हुए दूसरे पात्र में गिरता था। इस पात्र में एकत्र जल की मात्रा नाप कर समय अनुमान किया जाता था। बाद में पानी के स्थान पर बालू का प्रयोग होने लगा। इंग्लैंड के ऐल्फ्रेड महान ने मोमबत्ती द्वारा समय का ज्ञान करने की विधि आविष्कृत की थी। उसने एक मोमबत्ती पर, लंबाई की ओर समान दूरियों पर चिह्र अंकित कर दिए थे। प्रत्येक चिह्र तक मोमबत्ती के जलने पर निश्चित समय व्यतीत होने का ज्ञान होता था|

पहली घडी का अविष्कार और बदलती हुई तकनीक –

प्रारंभिक काल (ईसा की 10वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी के बीच तक का काल), जिसमें विभिन्न अन्वेषकों ने घड़ी निर्माण की नई-नई विधियाँ बतलाई और अपने-अपने तरीके से घड़ी के प्रारंभिक रूपों के निर्माण करने का प्रयत्न किया। कुछ आरंभिक घड़ियाँ केवल सिद्धातों के परीक्षण के उद्देश्य से बनाई गई थीं। व्यापारिक पैमाने पर उनका निर्माण नहीं हो सकता था। ऐसे प्रयासों का विशेष जोर यूरोप में ही था।जैसा की माना जाता है की पहली घड़ी सन् 996 में पोप सिलवेस्टर द्वितीय ने बनाई थी। यूरोप में घड़ियों का प्रयोग 13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में होने लगा था। इंग्लैंड के वेस्टमिंस्टर के घंटाघर में सन् 1288 में तथा सेंट अल्बांस में सन् 1326 में घड़ियाँ लगाई गई थीं। डोवर कैसिल में सन् 1348 में लगाई गई घड़ी जब सन् 1876 ई. विज्ञान प्रदर्शनी में प्रदर्शित की गई थी, तो उस समय भी काम कर रही थी।

यांत्रिक घडी बनने की शुरवात-


सन् 1300 में हेनरी डी विक (Henry de Vick) ने पहिया (चक्र), अंकपृष्ठ (डायल) तथा घंटा निर्देशक सूईयुक्त पहली घड़ी बनाई थी, जिसमें सन् 1700 ई. तक मिनट और सेकंड की सूइयाँ तथा दोलक लगा दिए गए थे। आजकल की यांत्रिक घड़ियाँ इसी शृंखला की संशोधित, संवर्धित एवं विकसित कड़ियाँ हैं|यांत्रिक घड़ी की आवर्तक क्रिया किसी दोलक, अथवा संतुलन चक्र और संतुलन कमानी, अथवा बालकमानी, के दोलन पर निर्भर करती है। इन यंत्रों की आवर्त गति अत्यंत नियमित क्रम से होती है। इनके साथ अनेक दाँतेदार पहियों का संबंध होता है। दोलन प्रणाली का एक दोलन पूरा होने पर इन पहियों के एक या एक से अधिक दाँते धूमते हैं। इस प्रकार ये पहिए दोलनों की गणना करते हैं।

इन पहियों से घड़ी की सूइयाँ जुड़ी होती हैं, जो डायल (dial) पर घूमती हैं और डायल पर अंकित समयविभाग की सहायता से समय बतलाती हैं। अंकपृष्ठ घंटों, मिनटों और सेकेंडों में विभक्त रहता है। दोलक एवं गणकयंत्र प्रणालियों को निरंतर चलाते रहने के लिये वांछित ऊर्जा कमानी या भार द्वारा प्राप्त होती है। साधारण तौर पर दोलक प्रणाली को गणक प्रणाली से ऊर्जा एक विशेष यांत्रिक व्यवस्था द्वारा प्राप्त होती है, जिसे पलायन तंत्र कहते हैं।

घडीलेकिन इस दौर लगता है घडी पहनने का संस्कृति ख़तम या लुप्त हो रही है क्योकि तकनीक का विकास तेज़ी से हो रहा है अब हर स्मार्टफोन में घडी रहती ही है | लेकिन कई लोग घड़ियों के बहुत ही शौक़ीन होते है और इसलिए बाजार में कई तरह कई वेराइएटी की घडिया मिलती है और घडिया हर उम्र और हर क्लास की लिए बनती है घडिया 100 रूपए से लेकर 1 करोड़ तक दाम तक की है | अब तो इलेक्ट्रॉनिक घड़ियाँ भी बहुत बाजार में है |

नयी घडी और रोलेक्स –

नए -नए स्मार्ट फ़ोन बनाने वाली कंपनी इस तरह के वाच बना रही जो आजकल अलेक्सा से जुड़ जाती है | रोलेक्स घड़ी को रुतबे का प्रतीक माना जाता है घड़ी की सबसे बड़ी एकल लक्जरी ब्रांड है|जो प्रतिदिन 2,000 घड़ियों का उत्पादन करती है| रोलेक्स घड़ी दुनिया में भी बहुत नाम रखती है |भारत में टाटा ग्रुप की टाइटन और फास्ट्रैक का बढ़ा नाम है ये भी बहुत ही अच्छी घड़ियाँ बनाती है और अच्छे दामों पर उसे भारतीय बाज़ारो में बेचती है |पहले घड़ियाँ समय देखने के लिए लोग पहनते थे लेकिन अब तो घड़ियाँ शौक के लिए पहनी जा रही है |समय तो किसी का भी घडी पर तो निर्भर नहीं करता है |इसलिए घडी सस्ती ख़रीदे या महंगी टाइम तो उतना ही दिखाती है |

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