चुनावी राजनीति : जब प्रतिद्वंदी को आपकी मजबूरियों और सीमाओं का भान हो –

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चुनावी राजनीति

चुनावी राजनीति:मजबूरिया और सीमाएं –

मोदी -02 का एक वर्ष मई महीने में पूरा हो चूका है | पिछले एक वर्ष का कार्यकाल मोदी सरकार के अपने कोर एजेंडे( धारा-३७० ,मंदिर निर्माण , समान नागरिक सहिंता ) के दो -तिहाई हिस्से को पूरा करने का वर्ष रहा है | धारा 370 और 35A को सरकार ने समाप्त कर दिया और मंदिर निर्माण का रास्ता माननीय उच्चतम न्यायालय ने साफ़ कर दिया |हाल -फ़िलहाल CAA भी चुनौती विहीन दिख रहा है|
दिल्ली का ‘ यासीन बाग ‘ हो या प्रयागराज का ‘मंसूर पार्क’ दोनों स्थानों से ‘कोरोना ‘ के चलते आंदोलनकारी हटाए जा चुके है | दिल्ली में तो दिल्ली दंगों और CAA के विरुद्ध प्रदर्शनो के बीच के सम्बन्ध को दिल्ली -पुलिस खंगालने का दावा कर रही है |कुछ एक विपक्षी दलों को छोरकर कोई दल खुलकर CAA के विरोध में अब नहीं आ पा रहा है |

चुनावी राजनीति (3)

कोविड-19 के मामले में भी जब संक्रमितों की संख्या सैकड़ों में भी नहीं थी तो नोटबंदी की तर्ज़ पर मोदी सरकार एक दिन के नोटिस पर पूर्ण लॉकडाउन करती है | जब संक्रमितों लाखो में पहुंचते है तो अनलॉक की प्रक्रिया शुरू कर देती है | ‘ इक्कीस दिन ‘ कोरोना मुक्ति के लिए मांगने वाली मोदी जी तीन माह पहले ही ले चुके है |…………और लगता है कोविड-19 के साथ जदोजहद अभी और लम्बी चलेगी |
चीन के साथ विवाद के सवाल पर अगर ‘ मोदी सरकार ‘ के तर्क को माना भी जाये , की चीन ने धोखा दिया , तो भी मोदी सरकार इस आरोप से बरी नहीं हो जाती की शी जिनपिन के इरादों को समझने में मोदी जी चूक गये|
रही बात श्रमिकों , किसानो, छोटे व्यपारियों . कामकाजी लोगों , छात्रों -नवजवानो की तो इस कोरोना काल में इनकी स्थिति के बारे में कहना ही क्या ?
इन सब के बावजूद मोदी सरकार अभी भी सशक्त और आशक्त लग रही है |सामाजिक -राजनैतिक वैज्ञानिक क्या इसी वजह से मोदी उभार को ‘ मोदी परिघटना ‘ कहते है |
मोदी के चुनावी प्रतिद्वंदी चुनावी क्षेत्र में भी और राजनैतिक बहसों में भी ‘ मोदी ‘ के सामने पस्त दीखते है | चुनावी राजनीती में कई बार ऐसा दीखता है की विपक्षी भले ही चुनाव हार रहे हो किन्तु नैतिक व् वैचारिक स्तर पर सत्ताधारी दल से बीस पड़ते है |किन्तु यहाँ तो स्थिति दूसरी ही दिख रही है |नैतिक और वैचारिक स्तर पर भी विपक्ष के पास लगता है जनता को कुछ देने के लिए बचा ही नहीं है |
उदाहरण के लिए मुख्या विपक्षी दल कांग्रेस को ले तो ‘पार्टी ‘ ऐसा लगता है मानो ‘ नेहरू परिवार ‘ की निजी सम्पत्ति हो गयी है | इस बाध्यता को मोदी -शाह की भाजपा खूब अच्छे से समझती है | गाँधी परिवार की रणनीति चार स्तरों पर कार्य करती रही है |

चुनावी राजनीति (2)

1 – सारा श्रेय आजादी के बाद से गाँधी परिवार को देना यहाँ तक की कांग्रेस के दूसरे प्रधानमंत्रियों – नरसिम्हाराव और मनमोहन सिंह को भी हाशिये पर रखना |
2 – भ्रष्टाचार , भाई -भतीजावाद , बाबरी विध्वंश ये सबकुछ दुसरो ( मनमोहन सिंह ) पर मढ़ने देना और श्रेय ( मनरेगा ) स्वम ( सोनिया गाँधी ) लेते रहना |
3 – पार्टी में राहुल -प्रियंका के वर्चस्व को बनाये रखने के लिए नयी पीढ़ी भले ही वंशवाद आधारित हो , ( सचिन पायलेट , सिंधिया आगे बढ़ने से रोकना |
4 – भ्रष्टाचार , वंशवाद , अवसरवादी साम्प्रदायिक प्रयोग के आरोपों से घिर जाने पर कांग्रेस के बहाने गाँधी परिवार को भारत के विचार ( आईडिया ऑफ़ इंडिया ) और धर्मनिरपेक्षतावाद का एक मात्र रक्षक घोषित करने का प्रयास करना |
मोदी -शाह की भाजपा गाँधी परिवार की इस स्थिति को बखूबी समझती है और समझते -भुझते इसका दोहन भी जम के कर रही है |
गाँधी -पटेल -बोस -आंबेडकर को छोड़कर ‘ नेहरू ‘ को टारगेट करना हो या फिर राजीव गाँधी को कटघरे में खड़ा करना हो |राहुल गाँधी को ‘युवराज ‘ कह के सम्बोधन भी इसी रणनीति का हिस्सा है इस मामले में दिलचस्प ये है की भाजपा इंदिरा गाँधी को कुछ ज्यादा नहीं कहती क्यों की कुछ मामलो में इंदिरा गाँधी उनकी राजनीती के लिए अनुकूल लगती है |बांग्लादेश की लड़ाई उनमे से एक है |

मोदी -शाह उभार में गाँधी परिवार का योगदान –

सोनिया गाँधी का प्रतक्ष्य राजनीती में पर्दापर्ण , गुजरात दंगों , सप्रंग का गठन ये सब लगभग एक कालखंड की घटनाये है | देश के पैमाने पर मुस्लिम वोटो का ध्रवीकरण कांग्रेस के पक्ष में करने के लिए ताकि दूसरी सेक्युलर क्षेत्रीय पार्टिया में मुसलमान वोट न छिटक जाये , कांग्रेस ने गुजरात दंगों और मोदी -भय को लगातार जीवित रखा |स्वयंसेवी सस्थाओं (NGO ) तरह -२ के प्रकाशनो , मीडिया संस्थानों वैगरह का प्रयोग करके ‘मोदी ‘ को देश के घर -घर में चर्चा का विषय बना डाला |
सोनिया गाँधी ने तो मोदी को इतना महत्व दिया की हर बार (२००७, २०१२ ) का गुजरात चुनाव मोदी vs सोनिया ही हो गया | जिसमे हर बार सोनिया गाँधी ही मात खाई और मोदी ने भी इन चुनावो को राष्ट्रीय स्तर के चुनाव ( २०१४) के पहले के क्वार्टर फाइनल और सेमी फाइनल की तरह खूब भुनाया |

चुनावी राजनीति (4)

अन्ना -आंदोलन , भ्रष्टाचार , भाई -भतिजावाद अराजकता वैगरह के आरोपों से घिरे गाँधी परिवार और कांग्रेस ने फिर से फासिस्ट मोदी , फासीवाद , संघ परिवार वैगरह का रण अलापना खुद से , और अपनी समर्थक संस्थाओं के माध्यम से शुरू कर के मोदी को केंद्र में ला खड़ा किया |
भारतीय पूंजीपतियों को ये लग ही रहा था की मोदी जैसा व्यक्ति उनके लिए फिलवक्त गाँधी परिवार से बेहतर साबित होगा बाकि तो सब जानते है |
एक दौर था जब आरएसएस , मोदी , आडवाणी वैगरह का भय कांग्रेस और दूसरी क्षेत्रीय दलों के सत्ता में बने रहने की पूर्व शर्त थी , लेकिन अब पैराडाइम ऐसा बदला , की मोदी -शाह के सत्ता में बने रहने के लिए -” गाँधी परिवार “और बाकी वंशवादी दलों का इसी रूप में अस्तित्व में रहना -पूर्व शर्त की तरह हैं|फिर तेजस्वी -अखिलेश -मायावती -राहुल गाँधी जैसे प्रतिद्वंदी मोदी -शाह -आदित्यनाथ आखिर क्यों नहीं चाहेंगे ?

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