ज्ञानपीठ पुरस्कार -भारतीय साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार क्यों है ?

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ज्ञानपीठ पुरस्कार

भारतीय ज्ञानपीठ न्यास और ज्ञानपीठ पुरस्कार-

ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय ज्ञानपीठ न्यास की ओर से भारतीय साहित्य के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है|1961 में भारतीय ज्ञानपीठ के संस्थापक श्री साहू शांति प्रसाद जैन के पचासवें जन्म दिवस पर इसकी शुरुआत हुई| इस पुरस्कार की खासियत कह सकते है या ख़ूबी क्योकि भारत एक ऐसा देश जहा पे बहुत ढेर सारी भाषाएँ बोली जाती है | हर क्षेत्र की अलग -अलग भाषा है | इस पुरस्कार में भारत में बोली जाने वाली हर भाषा को शामिल किया गया है |भारत का कोई भी नागरिक जो आठवीं अनुसूची में बताई गई २२ भाषाओं में से किसी भाषा में लिखता हो इस पुरस्कार के योग्य है। पुरस्कार में ग्यारह लाख रुपये की धनराशि, प्रशस्तिपत्र और वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा दी जाती है।

सबसे पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार किसको और कब दिया गया ?

1961 के बाद कई गोष्ठिया हुई और पुरे ४ साल बाद 1965 में पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया | और वो भी मलयालम लेखक जी शंकर कुरुप को प्रदान किया गया था। उस समय पुरस्कार की धनराशि 1 लाख रुपए थी। इनका पूरा नाम गोविन्द शंकर कुरूप था | इनको रचना ओटक्कुषल् (बाँसुरी) है जिसे ज्ञानपीठ के लिए १९६५ में चुना गया। इसकी कविताओं में भारतीय अद्वैत भावना का साक्ष्य है| ये रचना पूरी मलयालम में थी |

ज्ञानपीठ पुरस्कार (3)

२००२ में इसके नए संस्करण के प्रकाशन के समय में इन्होने अपनी रचना के बारे में कहा था -“हो सकता है कि कल यह वंशी, मूक होकर काल की लम्बी कूड़ेदानी में गिर जाये, या यह दीमकों का आहार बन जाये, या यह मात्र एक चुटकी राख के रूप में परिवर्तित हो जाये। तब कुछ ही ऐसे होंगे जो शोक निःश्वास लेकर गुणों की चर्चा करेंगे; लेकिन लोग तो प्रायः बुराइयों के ही गीत गायेंगे : जो भी हो, मेरा जीवन तो तेरे हाथों समर्पित होकर सदा के लिए आनन्द-लहरियों में तरंगित हो गया।’’ धन्य हो गया।’’
1982 तक ये पुरस्कार लेखक की एकल कृति को दिया जाता था | उसके बाद ये पुरस्कार लेखक के भारतीय साहित्य में संपूर्ण योगदान के लिये दिया जाने लगा|

ज्ञानपीठ पुरस्कार (2)

ये पुरस्कार कितनी भाषा को कितनी बार मिला –

अब तक हिन्दी तथा कन्नड़ भाषा के लेखक सबसे अधिक सात बार यह पुरस्कार पा चुके हैं। यह पुरस्कार बांग्ला को ५ बार, मलयालम को ४ बार, उड़िया, उर्दू और गुजराती को तीन-तीन बार, असमिया, मराठी, तेलुगू, पंजाबी और तमिल को दो-दो बार मिल चुका है।1 लाख रुपये की पुरस्कार राशि से प्रारंभ हुए इस पुरस्कार की राशि को 2005 में 7 लाख रुपए कर दिया गया| 2005 के लिए चुने गए हिन्दी साहित्यकार कुंवर नारायण पहले व्यक्ति थे, जिन्हें 7 लाख रुपए का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ. साल 2012 से ज्ञानपीठ पुरस्कार के रूप में दी जाने वाली राशि को 7 लाख रुपये से बढ़ाकर 11 लाख रुपये कर दिया गया है|

इस पुरस्कार में वाग्देवी का कांस्य प्रतिमा ही क्यों दी जाती –

ज्ञानपीठ पुरस्कार में प्रतीक स्वरूप दी जाने वाली वाग्देवी का कांस्य प्रतिमा मूलतः धार, मालवा के सरस्वती मंदिर में स्थित प्रतिमा की अनुकृति है। इस मंदिर की स्थापना विद्याव्यसनी राजा भोज ने १०३५ ईस्वी में की थी। अब यह प्रतिमा ब्रिटिश म्यूज़ियम लंदन में है। भारतीय ज्ञानपीठ ने साहित्य पुरस्कार के प्रतीक के रूप में इसको ग्रहण करते समय शिरोभाग के पार्श्व में प्रभामंडल सम्मिलित किया है। इस प्रभामंडल में तीन रश्मिपुंज हैं जो भारत के प्राचीनतम जैन तोरण द्वार (कंकाली टीला, मथुरा) के रत्नत्रय को निरूपित करते हैं। हाथ में कमंडलु, पुस्तक, कमल और अक्षमाला ज्ञान तथा आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि के प्रतीक हैं|

ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले लेखक –

1965- जी शंकर कुरुप (मलयालम)

1966- ताराशंकर बंधोपाध्याय (बांग्ला)

1967- केवी पुत्तपा (कन्नड़) और उमाशंकर जोशी (गुजराती)

1968- सुमित्रानंदन पंत (हिन्दी)
1969- फिराक गोरखपुरी (उर्दू)

1970- विश्वनाथ सत्यनारायण (तेलुगु)

1971- विष्णु डे (बांग्ला)

1972- रामधारी सिंह दिनकर (हिन्दी)

1973- दत्तात्रेय रामचंद्र बेन्द्रे (कन्नड़) और गोपीनाथ महान्ती (ओड़िया)
1974- विष्णु सखा खांडेकर (मराठी)

1975- पी.वी. अकिलानंदम (तमिल)

1976- आशापूर्णा देवी (बांग्ला)

1977- के. शिवराम कारंत (कन्नड़)

1978- एच. एस. अज्ञेय (हिन्दी)

1979- बिरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य (असमिया)

1980- एस.के. पोट्टेकट (मलयालम)
1981- अमृता प्रीतम (पंजाबी)

1982- महादेवी वर्मा (हिन्दी)

1983- मस्ती वेंकटेश अयंगर (कन्नड़)

1984- तक्षी शिवशंकरा पिल्लई (मलयालम)

1985- पन्नालाल पटेल (गुजराती)

1986- सच्चिदानंद राउतराय (ओड़िया)
सब लेखक के नाम यहाँ नहीं दे सकते है |ये भारत का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के श्रेणी में आता है | और एक से बढ़ के एक लेखक को ये गौरव प्राप्त हो चूका है |

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