बचपन से हम अपने घरों में सुनते आये हैं की हम मनुष्य , वानरों की संताने है | कुछ बड़े होने पर जीव विज्ञान के कोर्स की किताब में थोड़ा -बहुत मानव उदविकास और डार्विन के उदविकास के सिद्धांत (डी थेओरम ऑफ़ एवोलोशन) के बारे में पढ़ा| हालाँकि डार्विन का उदविकास का सिद्धांत जीव विज्ञान का एक मान्य सिद्धांत है किन्तु गाहे-बगाहे इस सिद्धांत के विरुद्ध तरह -तरह के तर्क पेश किये जातें है |

अभी हाल ही में कुछ महीनो पूर्व भारत के शिक्षा राज्य मंत्री श्री ‘ सत्यपाल सिंह ‘ ने ये कहा की “अगर इंसान के पूर्वज
बन्दर है तो आज तक किसी ने बंदर को आदमी बनते क्यों नहीं देखा | इंसान हमेशा से इस धरती पर इंसान के रूप में ही रहे है | डार्विन का सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से गलत है |”

ये वही ‘ सत्यपाल सिंह ‘ है जो मुंबई के पूर्व पुलिस प्रमुख रह चुके है और अपने छात्र जीवन में विज्ञान के छात्र रहे है | रसायन विज्ञान में इन्होने दिल्ली विश्वविधालय से पी. एच .डी भी की है |

Darwin - डार्विनडार्विन के सिद्धांत के रूप में मूल प्रश्न पर लौटने से पहले चार्ल्स डार्विन के जीवन के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातों को जान
लेना दिलचस्प होगा | चार्ल्स डार्विन का जन्म १२ फरवरी १८०९ में श्रॉप्सयार इंग्लैण्ड में हुआ था | पिता ने अपनी तरह
डॉक्टर बनाने के लिए डार्विन को ‘ एडेनवर्गविश्वविद्द्यालय के मेडिकल स्कूल ‘ में पढ़ने भेजा लेकिन डार्विन को शल्य क्रिया
(सर्जरी) और लेक्चर ने मेडिकल की पढाई से बिदका दिया | लैमार्क और अपने दादा की उदविकास सम्बन्धी विचारों ने
डार्विन को फिर से अपने प्रिय विषय जीव जगत की ओर धकेला |

डार्विन के जीवन का सबसे प्रतीक्षित मोड़ तब आया जब उन्हें पानी के जहाज ‘ एच .म.स . बीगल ‘ से ५ वर्षोंके लिए पूर्वी अफ्रीका के तटवर्ती इलाकों समेत सम्पूर्ण दक्षिणी अमेरिका के यात्रा करके पौधों , पक्षिओं ,जीव ,जंतुओं पर शोध करने का अवसर प्राप्त हुआ |

ये जहाज १८३१ में इंग्लैण्ड से रवाना हुआ और ५ वर्षों बाद १८३६ में इंग्लैण्ड पंहुचा |

बीगल की यात्रा न केवल विभिन्न्य जीव जंतुओं के अवलोकन का मौका डार्विन को दिया बल्कि जिस परिवेश में ये जीव
जंतुओं रह रहे थे उसके साथ इनके सम्बन्ध को भी समझने का सु -अवसर प्रदान किया | इस यात्रा के दौरान डार्विन ने तरह-तरह पक्षिओं , जंतुओं अवशेषों को संग्रहित किया |

बीगल के अपने संग्रह का गहन अध्ययन करने के साथ -साथ अगले बीस वर्षों तक डार्विन किसी ने किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए गहन अध्यन , चिंतन -मन्नन और उस दौर में जीव -विज्ञान में चल रही हलचलों में
लगातार भाग भी लिया और उस पर अपनी नज़र भी रखी|

इन बीस वर्षों के दौरान उन्होंने नए तथयों भी लगातार जुटाए |इस अथक परिश्रम के बाद जिसने उनके स्वास्थ पर बुरा प्रभाव भी डाला अंततः वो दौर आ गया जब वो अपने निष्कर्षों को ठोस रूप दे सकते थे | १८५९ में उनकी कालजयी
किताब ‘ ऑन डी ऑरिजिन ऑफ़ स्पेसिस ‘ प्रकशित हुई | इसमें डार्विन ने अपने अकाट्य तथ्यों और तर्कों के माध्यम से
‘उदविकास के सिद्धांत ‘ को मूर्त रूप प्रदान किया | ज़ाहिर है दुनिया में तहलका मचना ही था और मचा भी | वैज्ञानिक
समुदाय और शिक्षित लोगों ने १८७० तक उदविकास के सिद्धांत को एक तथ्य के रूप में स्वीकार कर लिया किन्तु चर्च इस
सिद्धांत का लगातार सख्त विरोध करता रहा |

कहते हैं की ‘ ऑन डी ऑरिजिन ऑफ़ स्पेसिस ‘ किताब उस दौर में बाइबिल के बाद सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब थी | जबकि ये पढ़ी ये बाइबिल से भी ज्यादा गयी |इस किताब की एक सबसे बड़ी खूबसूरती ये भी है की ये आम
पाठक वर्ग या आम शिक्षित व्यक्ति को ध्यान में रखकर लिखी गयी है |उदविकास के सिद्धांत ने जितना वैज्ञानिक को
अचम्भित किया उतना ही आम पाठक को भी आस्चर्यचकित किया | जीव जात में इतनी विभिन्नता क्यों है ? एक ही प्रजाति
में भी इतनी भिनता क्यों है ?

शेर - रॉयल बंगाल टाइगरऐसयातिक शेर अफ्रीकन शेरों से अलग क्यों है ?भारतीय हाथी अफ्रीकन हाथियों से अलग क्यों है ?रॉयल बंगाल टाइगर
बाकि के बाघों से अलग क्यों ?

क्यों इतने तरह के गुलाब ? इस और इस जैसे ढेरों सवालों के जवाब डार्विन के उदविकास के सिद्धांत में मौजूद है |जंतु और पादप क्यों विलुप्त होते है इसका भी जवाब डार्विन देते है |
क्रमशः

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