दलाई लामा कौन है ?

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दलाई लामा

दलाई लामा और चीन

चीन और दलाई लामा का इतिहास ही चीन और तिब्बत का इतिहास है सन 1409 में जे सिखांपा ने जेलग स्कूल की स्थापना की थी और इस स्कूल के माध्यम से बौद्ध धर्म का प्रचार किया जाता था।यह जगह भारत और चीन के बीच थी जिसे तिब्बत नाम से जाना जाता है इसी स्कूल के सबसे चर्चिच छात्र थे गेंदुन द्रुप. गेंदुन जो आगे चलकर पहले दलाई लामा बने।बौद्ध धर्म के अनुयायी दलाई लामा को एक रूपक की तरह देखते हैं और वहा इन्हें करुणा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

दलाई लामा को मुख्य रूप से शिक्षक होते है –

दूसरी तरफ़ इनके समर्थक अपने नेता के रूप में भी देखते हैं।ये मुख्य रूप से शिक्षक के तौर पर देखा जाता है लामा का मतलब गुरु होता है और लामा अपने लोगों को सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं।1630 के दशक में तिब्बत के एकीकरण के वक़्त से ही बौद्धों और तिब्बती नेतृत्व के बीच लड़ाई है मान्चु, मंगोल और ओइरात के गुटों में यहां सत्ता के लिए लड़ाई होती रही है अंततः पांचवें लामा तिब्बत को एक करने में कामयाब रहे थे।इसके साथ ही तिब्बत सांस्कृतिक रूप से संपन्न बनकर उभरा था।तिब्बत के एकीकरण के साथ ही यहां बौद्ध धर्म में संपन्नता आई।जेलग बौद्धों ने 14वें लामा को भी मान्यता दी।

चीन क्यों नहीं दलाई लामा को मान्यता देता है –

दलाई लामा के चुनावी प्रक्रिया को लेकर ही विवाद रहा है. 13वें दलाई लामा ने 1912 में तिब्बत को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। क़रीब 40 सालों के बाद चीन के लोगों ने तिब्बत पर आक्रमण किया।चीन का यह आक्रमण तब हुआ जब वहां 14वें दलाई लामा को चुनने की प्रक्रिया चल रही थी।तिब्बत को इस लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा। कुछ सालों बाद तिब्बत के लोगों ने चीनी शासन के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिय।ये अपनी संप्रभुता की मांग करने लगे हालांकि विद्रोहियों को इसमें सफलता नहीं मिली।

लामा को लगा कि वह बुरी तरह से चीनी चंगुल में फंस जाएंगे।इसी दौरान उन्होंने भारत का रुख़ किय।दलाई लामा के साथ भारी संख्या में तिब्बती भी भारत आए थे।यह साल 1959 का था।चीन को भारत में दलाई लामा को शरण मिलना अच्छा नहीं लगा तब चीन में माओत्से तुंग का शासन था।

दलाई लामा और चीन के कम्युनिस्ट शासन के बीच तनाव बढ़ता गया।दलाई लामा को दुनिया भर से सहानुभूति मिली लेकिन अब तक वह निर्वासन की ही ज़िंदगी जी रहे हैं।1989 में दलाई लामा को शांति का नोबेल सम्मान मिला।लामा का अब कहना है कि वह चीन से आज़ादी नहीं चाहते हैं,लेकिन स्वायतता चाहते हैं1950 के दशक से दलाई लामा और चीन के बीच शुरू हुआ विवाद अभी ख़त्म नहीं हुआ है दलाई लामा के भारत में रहने से चीन से रिश्ते अक्सर ख़राब रहते हैं।

चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो के बारे में –

दलाई लामा का आज जन्मदिन है और वो अब 86 साल के हो गये है और 61 साल से भारत में ही रह रहे है। चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो (6 जुलाई, 1935 – वर्तमान) तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू हैं।उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को उत्तर-पूर्वी तिब्बत के ताकस्तेर क्षेत्र में रहने वाले ये ओमान परिवार में हुआ था।दो वर्ष की अवस्था में बालक ल्हामो धोण्डुप की पहचान 13 वें लामा थुबटेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में की गई।लामा एक मंगोलियाई पदवी है जिसका मतलब होता है ज्ञान का महासागर और लामा के वंशज करूणा, अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप माने जाते हैं।

बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने अपने निर्वाण को टाल दिया हो और मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो।उन्हें सम्मान से परमपावन भी कहा जाता है।भारत का रुख समय -समय पर तिब्बत पर बदलता रहता है।सबकी नज़र ये रहेगी की भारत के प्रधानमंत्री मोदी सार्वजानिक रूप लामा को उनके जन्मदिन पर विश करते है की नहीं क्योकि भारत का इन दिनों चीन से बहुत तनाव चल रहा है।

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