दादा साहब फाल्के पुरस्कार : अमिताभ को या अमिताभ परिघटना को ?

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दादा साहब फाल्के पुरस्कार

दादा साहब फाल्के पुरस्कार : अमिताभ को या अमिताभ परिघटना को ?

अल -जजीरा( पत्रकार ) – जब आप और सलीम साहब पटकथा लेखन कर रहे थे , तो क्या इस बात से सचेत थे या कहे की जानते समझते ‘एंग्री यंग मैन’ फिनोमिना गढ़ रहे थे ?

जावेद अख्तर -नहीं सीधे तौर पर तो बिलकुल भी नहीं | न ही सचेत होकर हम किसी ‘ एंग्री यंग मैन ‘का निर्माण कर रहे थे | हां अप्रत्यक्ष तौर पर ऐसा हो सकता है की व्यवस्था के प्रति रोष और नाराजगी का प्रभाव हमारे पटकथा लेखन पर पड़ा हो |

इस साक्षात्कार से दो चीजें बिल्कुल साफ़ पता चलती है | पहला कोई कितना भी चाहे किसी फिनामिना का निर्माण मनचाहे तरीके से नहीं कर सकता तब फिर दूसरा पहलु सामने आता है की कोई भी परिघटना अपने दौर , उस दौर के समाज की राजनैतिक , आर्थिक ,सामाजिक और व्यवस्थागत परिस्थति की वजह से अस्तित्व में आती है |

दादा साहब फाल्के पुरस्कार

इस सवाल को दूसरे तरीके से भी हम ले सकते है | इसमें कोई संदेह नहीं है की अमिताभ एक बेहतरीन अभिनेता है और उन्होंने अपने अभिनय को समय के हिसाब से बहुत ही प्रभावी तरीके से ढाला भी है |लेकिन जब हम कहते है की ” समय के हिसाब से प्रभावी तरीके से ढाला है ” तो क्या ये अपने आप में ‘समय ‘ के बदलाव के साथ परिस्थतियों के बदले जाने की तस्दीक नहीं करता है ?

इसका अर्थ है की रुपहले पर्दे पर मात्र अभिनय ही आपको ‘ महानायक ‘ नहीं बनाता  वरन उस दौर की परिस्थितिया भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं | वही अमिताभ थे और वही ‘ एंग्री यंग मन ‘ की क्षवी थी | लेकिन जो एंग्री यंग मैन ७० और ८० के दशक में इतना चला वो उदारीकरण के दौर आने के बाद नहीं चल पाया |

चाहे -‘लाल बादशाह’ हो या’ छोटे मिया -बड़े मिया ‘जैसी फिल्मे हो | अंततः दर्शकों या दूसरे शब्दों में कहे की परिस्तितियों में सदी के महानायक के हिसाब से खुद को नहीं बदला | बल्कि ‘महानायक ‘को समाज की गति के हिसाब से बदल जाना पड़ा |

७० के दशक की परिस्थति –

७० का दशक आजाद भारत खास स्थान रखता है |सकल हरित क्रांति चल रही थी | इस हरित ‘क्रांति’ के साथ देश के गांव सामाजिक न्याय के नारे घूम रहे थे |सामंत या जमींदार विरोधी आंदोलन कई बार हिंसक रूप भी ले रहे थे |गांव -गिराव में सामाजिक तनाव बढ़ रहा था | जमीन और मजदूरी के सवाल को लेकर ‘ नक्सलबाड़ी ‘ जैसा हिंसक आंदोलन देश के सामने था | गांव के एक हिस्से ( गरीब -वंचित ) का ‘ नेहरू के समाजवाद ‘ के वादों से मोहभंग हो चूका था |

दूसरी ओर शहरो में अमीर -गरीब के बीच की खाई बढ़ रही थी |नेहरू के समाजवाद के ताव -तेवर ख़त्म होने के साथ लालफीताशाही और भ्र्स्टाचार के मामले सामने आ रहे थे | हड़तालों और अशांति से शहर प्रभवित थे | रेलवे की सबसे बड़ी हड़ताल का दौर भी वही था |

७० का दशक छात्र आंदोलन की दृष्ट्रि से भी बहुत ही सवेंदनशील दशक था |भारत में ही नहीं पुरे विश्व में छात्र आंदोलन की एक लहर चल रही थी |वैश्विक स्तर पर वियतनाम त्रासदी ‘ के बाद शीत-युद्ध चरम पर था |दुनिया किसको ( साम्राज्वाद या पूंजीवाद ) अपने भविष्य के रूप में चुनेगी ये सवाल तीव्र से तीव्र होता जा रहा था | सोवियत व्यवस्था से मोहभंग  होना शुरू हो गया था और चीन की ‘ सांस्कृतिक क्रांति ‘ ने साहित्य , फिल्म और समाज को अन्य तरीके से देखने पर जोर देना शुरूकिया था |

इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में सरकार ने भ्र्ष्टाचार के साथ -साथ तानाशाही प्रवित्तिया जोर पकड़ रही थी | ये प्रवित्तिया माध्यम वर्ग को भी असंतुष्ट  कर जाया करती थी |स्वतंत्रा आंदोलन के आदर्श तेज़ी से तिरोहित हो रहे थे |और नेता -पूंजीपति -माफिया नेक्सस तेजी से लोगों के सामने दिख रहा था |

कुल मिलाकर जनता विभिन्य शोसित और असंतुष्ट थे लेकिन अभिव्यक्त करने में लाचार दीखते थे |कोई ठोस रास्ता इन समूहों के सामने नहीं था | ऐसी स्थति में इनके रोष को अभिव्यक्त करना और व्यक्तिगत तौर पर नायक को जीतते हुए देखना दोनों लोगों की दो तरफ़ा भावनाओं को तुष्ट किया |

एक बात और ‘ एंग्री यंग मैन ‘ परिघटना निश्चित तौर पे पलायनवादी ( सामाजिक दृष्टि से ) थी |देश की भारी आबादी जहा लाचारगी का अनुभव करती हो ( व्यवस्था के प्रति सामान रोष के बाद भी ) और कोई संगठित संघर्ष सफल भी होता नहीं दिख रहा हो वहाँ नायक का अकेले दम पर ताकतवर और पैसे वालों लोगों को सबक सिखाना और जीतते हुए देखना अपनी जिंदगी की सच्चाई से भागने का साधन और तुष्टिकरण दोनों बन गया |

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