नागरिकता संशोधन कानून –

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नागरिकता संशोधन कानून

नागरिकता संशोधन कानून –

भारतीय संसद ने ११ दिसंबर २०१९ को नागरिकता संशोधन विधेयक को कानून के रूप में मान्यता दे दी | जैसा की ‘ संशोधन ‘ शब्द से मान होता है की ये अपने आप में कोई नया कानून नहीं है | बल्कि किसी पुराने ‘ नागरिकता कानून ‘ का संशोधित प्रारूप है | पुराना नागरिकता कानून जो की १९५५ में अस्तित्व में आया था जिसने विदेशी नागरिकों और शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करने के सन्दर्भ में कुछ निश्चित प्रिक्रियाओं और नियमवालियों का पालन किया जाना था , में नये संशोधन ने पाकिस्तान , बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले अल्पसंखयकों को राहत प्रदान की गयी है |

१९५५ का नागरिकता कानून , नागरिकता प्रदान करने के सन्दर्भ को दो हिस्सों में परिभाषित करता था | अविभाजित भारत के व्यक्तिओं के लिए नागरिकता प्राप्त करने हेतु पंजीयन की अवधि ७ वर्षों तक भारत में वास करने की थी | जबकि अविभाजित भारत से इतर ये अवधि ११ वर्ष की थी | नागरिकता संशोधन कानून (२०१९) निम्न प्रावधान को नागरिकता कानून १९५५ में समाहित करता है | ये निम्नलिखित प्रावधान तीन राष्ट्रों पाकिस्तान , बांग्लादेश और अफगानिस्तान के उत्पीड़ित अल्पसंखयकों समुदायों के सन्दर्भ में है |

 

” कोई भी व्यक्ति जो हिन्दू , सिख बौद्ध , जैन ,पारसी समुदाय से सम्बंधित हो और अफगानिस्तान , बांग्लादेश और पकिस्तान से भारत में ३१ दिसंबर २०१९ को या इससे पहले प्रवेश किया हो और जिन्हे केंद्र सरकार दवरा भाग c  के अनुभाग (२) के सेक्शन ३ के पासपोर्ट कानून (१९२०) और साथ ही विदेशी नागरिक कानून ( १९४६ )या कोई भी कानून व् आदेश जो इनके अंतर्गत हो -छूट प्रदान की जाती है | आगे से उपरोक्त हिस्से में आने वाले को ‘ गैर कानूनी शरणार्थी के रूप में नहीं देखा जायेगा “|

एक नया अनुभाग ६ बी जो इस कानून के साथ जोड़ा गया है की ‘नए कानून के लागु होने के साथ प्रथम भाग में उल्लेखित व्यक्तियों के समक्ष ये अहर्ता होगी ‘ गैर कानूनी अप्रवासी ‘ संबधी प्रक्रिया से मुक्त हो | नागरिकता को प्राप्त संबधी प्रक्रिया में भाग ले सकते है |

गौरतबल है की भारत में उन सबको ‘ जो बिना वैध यात्रा दस्तवेजों के या अनुभातिप्रदात समयांतराल के पश्चात भी भारत में निवास कर रहे है |अवैध अप्रवासियों के श्रेणी में रखा जाता है |

एक और महत्वपूर्ण तथ्य ये है की बाकि सारे अनुभाग (१९५५) के पूर्व की तरह ही नागरिकता कानून के हिस्सा रहेंगे |लम्बे समय से पाकिस्तान , बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे इस्लामिक राष्ट्र के धार्मिक अल्पसंख्यकों की ये मांग रही है की भारत सरकार अपनी नागरिकता की शर्तों में उनके लिए ढील दे | इन अल्पसंख्यक समुदाय की मांग थी की धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए भारत उनकी स्वाभाविक शरणस्थली हो सकती है | इसका कारण धार्मिक के आलावा भाषाई , सांस्कृतिक और ऐतिहासिक समानता को होना भी है |अन्वेषण संस्थान(IB )के अनुसार नये कानून की वजह से ३१३१३ शर्णार्थी तुरंत लाभविन्त होंगे | जिनमे २५४४७ हिन्दू , ५८०७ सिख , ५५ मशीही २ बौद्ध और २ पारसी है |

भारत सरकार का कहना है की नया कानून किसी भी तरह भारत के सविधान के बुनियादी ‘पंथनिरपेक्ष ‘ ढांचे की अवहेलना नहीं करता है | बल्कि पडोसी इस्लामिक देशों की उत्पीड़ित धार्मिक अल्पसख्यक आबादी को नागरिकता दे के सशक्त करता है | जहा तक इन तीन इस्लामिक राष्ट्रों के मुसलमान का सवाल है तो वो पहले की तरह भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं |

तब फिर समस्या कहा है ? सरकार का कहना है की ये कानून उपरोक्त तीन राष्ट्र के अल्पसंखयक को नागरिकता देने का कानून है | बस | लेकिन बात इतनी सी ही नहीं है | विरोध प्रदर्शनो के वर्तमान माहोल पर नज़रसानी करने पे कुछ बातें एक दम शीशे  की तरह साफ़ हो जाती है |

पहला तो असम में हो रहा विरोध प्रदर्शन दो भागों में बटा हुआ है | असम के भूमिपुत्रों को लगता है की इस कानून से बांग्लादेशी हिन्दुओ को नागरिकता मिल जाएगी और असम समेत दीगर संख्या उतर पूर्व के राज्यों के भूमिपुत्र अल्प्संक्यक हो जायेंगे |

देश के बाकि राज्यों में विशेषकर मुसलमानो के विरोध का कारण ज्यादा गहरा और मौजू है | पिछले साढ़े- पांच वर्ष में मोदी सरकार के दौरान लीचिंग हिन्दू -भावना को आहत होने  के नाम पर बुद्धिजीवों पत्रकारों की हत्या , ट्रॉल्लिंग , हिन्दू चरमपंथी को दोषमुक्त किया जाना के साथ -साथ सरकार के मंत्रियों समेत प्रधानमंत्री के बयां शमशान -कब्रिस्तान ईद में बिजली देना , दिवाली में नहीं वगैरह ने मुसलमानो में बेचैनी बड़ा राखी थी | उ प्र में योगी का मुख़्यमंत्री बनना इस बेचैनी को और बढ़ाया ही |ये सब मानो अभी कम था की रही सही कसर २०१९ के चुनाव के बाद सरकार के तबातोड़ फैसलों ने कर दी |तीन तलाक , ३७० का हटाना , बाबरी फैसला , असम में nrc और  अब CAA ने मुसलमानो में बेचैनी को इस सीमा तक बढ़ाया की वो सड़क पे आ गये है |

देश का नागरिक समाज , उदारपंती, वामपंथी भी मुसलमानो के साथ शाना-ब-शाना इस संघर्ष में भागीदार है | उनका कहना है की मोदी -२ मुसलमानो की अटरिंग युद्धःस्तर पे कर रही है |और वो ये अपनी तमाम नाकामयाबी , विशेष कर आर्थिक मोर्चे पर , से ध्यान हटाने के लिए कर रही है |आर्थिक मोर्चे पर हालत खस्ता है इसमें कोई दो राय नहीं | प्रधामंत्री मोदी अब २ करोड़ रोजगार , कला धन , अच्छे दिन की बात करना एक दम बंद कर चुके है ये भी दिख रहा है | मानवाधिकारों को लेकर अंतरास्ट्रीय स्तर पर भारत की क्षवि धूमिल हुई है | ये भी सही है की राज्य सत्ताओं का ये पुराण इतिहास रहा है की जब आर्थिक संकट गहराता है तो इनकी डिवाइड एंड डाइवर्ट की निति भी तीव्रता ग्रहण कर लेती है |

निष्कर्ष रूप में कहा जाये तो भारतीय समाज एक महत्वपूर्ण मुहाने पर खड़ा है | राजनैतिक रूप से इसकी सक्रियता बढ़ी है | नयी पीढ़ी का राजनीतिककरण भी बढ़ रहा है |जनवादी भावनाये भी उफान मार रही है | देश को अलग -अलग दिशाओं में ले जाने के प्रयासरत ताकते एक दूसरे से रसा -कशी कर रही है | समुद्र मंथन प्रांरभ हो गया ह लगता है देखते है भारतवर्ष कौन सी दिशा लेता है |

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