नासा क्यों एक टॉयलेट डिज़ाइन का दे रहा है 26 लाख ?

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नासा

नासा का टॉयलेट चैलेंज-

आपको सुनके हैरानी होगी की एक टॉयलेट डिज़ाइन करने के एवज में नासा क्यों लाखो बाँट रहा है | जैसा आप सोच रहे हो ऐसा एकदम नहीं है वो कई ऐसा -वैसा टॉयलेट डिज़ाइन नहीं मांग रहा है | स्पेस और चाँद पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए एक अत्याधुनिक टॉयलेट जरुरत पड़ेगी | इसी के लिए वो टॉयलेट का डिज़ाइन मांग रहा है और बाकायदा एक चैलेंज दिया है जो चैलेंज पूरा करेगा उसे 26.08 लाख रुपए का प्राइज मिलेगा|

अंतरिक्ष टॉयलेट और नार्मल टॉयलेट में क्या है अंतर –

अंतरिक्ष का टॉयलेट डिज़ाइन करना इतना आसान नहीं है | पहले तो इस टॉयलेट को डिज़ाइन करने में आपको पहले ये देखना होगा -माइक्रोग्रैविटी (अंतरिक्षीय गुरुत्वाकर्षण) और लूनर ग्रैविटी (चांद की गुरुत्व शक्ति) में काम करने लायक हो और बहुत हल्का हो और बेहतरीन रिसाइकिलिंग भी कर सके| अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यात्रियों को कई तरह की समस्यायों को रोज सामना करना पड़ता है | इस बार नासा चाँद पे एक महिला को भी भेजने वाला है तो इसलिए ये टॉयलेट -यूनिसेक्स भी होना चाहिए |

नासा (2)

आम तौर पर टॉयलेट की सीट के बीच 12 से 28 इंच का फासला ‌होता है, लेकिन स्पेस स्टेशन के टॉयलेट में मल त्याग के लिए लगभग 4 इंच का गोला होता है।यूजर को इसी में मल त्याग करना होता है। ये पूरा सिस्टम सेटअप बड़े तरीके से काम करता है। इसमें मल त्याग के बाद अंदर एक सक्‍शन सिस्टम होता है जो मल को खींचकर एक जगह स्टोर करता रहता हैं| स्पेस में मॉल त्याग करने के लिए बाकायदा अंतरिक्ष यात्रियों को ट्रेनिंग दी जाती हैं |

मानवता और विज्ञान –

अपोलो मिशन पे गए यात्री जब वापस लौटे तो उन्होंने मलमूत्र ( टॉयलेट ) त्यागने को अंतरिक्ष में बड़ी ही चुनौती बताया था |नासा ने इस चैलेंज को लूनर लू नाम दिया है| नासा ने अपने बयान में कहा है कि स्पेस टॉयलेट्स पहले से मौजूद हैं उपयोग भी हो रहा है लेकिन समय बदल रहा है और हमे और आधुनिक होने की जरुरत है ताकि हम जितना भी अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यात्रियों का जीवन अंतरिक्ष या चाँद पे सरल बना सके | जिससे की वो मानवता को विज्ञान द्वारा और भी उचाई तक पंहुचा सके |

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