फिल्म -सुपर -३० शिक्षा के दोहरे मयार से रूबरू कराती फिल्म

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इधर भारतीय पॉपुलर सिनेमा में एक खास तरह की प्रवृति दिखाई देती है | ये प्रवृति ही सत्य घटनाओं और पात्रों को केंद्र में रखकर बनने वाली फिल्मे |चाहे वो मिल्खा सिंह , हो या पान सिंह तोमर , पैड मन हो  वैगरह-२ इसी श्रेणी की फिल्म है | वास्तविक पात्रों की वजह से इन फिल्मो से दर्शक अपने आप को कनेक्ट भी कर पाता है |और पसंद भी करता है |

हलाकि हॉलीवूड और दिगर मुल्कों में पहले से ही सत्य घटनाओं और पात्रों पर फिल्मे बनती रही है | भारतीय सिनेमा में ये प्रवृति नयी ही कही जाएगी |निश्चित  तौर पे भारतीय दर्शकों में आया ये परिवर्तन भारतीय समाज की बनावट में आये परिवर्तन को दर्शाता है | अपेक्षाकृत गहरे निहितार्थ लिए हुए है |खैर इसकी चर्चा बाद में कभी , अभी फिल्म पे ध्यान केंद्रित किया जाये |

संसाधनों के आभाव में प्रतिभावों के विनाश के बारे में तो हर पढ़ा -लिखा समझदार भारतीय परिचित है | सवाल है इससे लड़ा कैसे जाये ?  अमीर -गरीब के बीच की खाई , दोहरी शिक्षा प्रणाली , सामाजिक वातावरण में असमानता  आदि के बारे में कौन परिचित नहीं है |

फिल्म ये दिखाने में पूरी तरह सफल रही की जिज्ञासा , प्रतिभा और क्षमता किसी विशेष वर्ग या जाति की बपौती नहीं है |वो गरीबी और साधनहीनता है जो फर्क पैदा कर देती है | लेकिन सवाल इससे बड़ा है और वो है की शिक्षा व्यवस्था में फैली इस असमानता से प्रभावी तौर पे कैसे निपटा जाये | व्यक्तिगत प्रयासों को इसका हल दिखा कर फिल्म अंतत पलायन का रास्ता चुनने के साथ -साथ व्यवस्था को दूसरे तरीके से बचाती है | यदपि एक ओर भटकती प्रतिभावो को दर्शाकर एक्सपोज़ व्यवस्था भी करती है | लेकिन साथ -साथ मशीहाई हल देकर पुरे सिस्टम की कमी को व्यक्तिगत प्रयासों से हल करने का भ्रम देती है |

फिल्म का डायलॉग ” राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा  राजा वही बनेगा जो हक़दार होगा ” देखने में सशक्त लगता है लेकिन पड़ताल करने पर इसमें भी उच्च -नीच की बू ही आती है | इस दूसरी जगह नायक कहता है -” किस्मत ने इन बच्चों के साथ जो किया वो क्या है प्रतिभा दिए साधन नहीं दिए ….”  यहाँ भी ये समझाना दिलचस्प है की किस्मत ने मजाक नहीं किया है | वल्कि व्यवस्था ने साधनहीन प्रतिभाओ के साथ मजाक किया है

खेल , ज्ञान शिक्षा वगैरह के क्षेत्र में व्यक्तिगत संघर्षों के माध्यम से अपनी सफलता के झंडे गाड़ने वालों पर फिल्म बनती है उन्हें पुरस्कार ओर धन भी दिए जाते है |लेकिन इससे व्यवस्था तो नहीं बदलती |व्यवस्था तो चल रही है | कभी -कभी लगता है की हम फिल्मो में व्यक्तिगत सफलता को देखकर ही संतुस्ट हो जाते है | और व्यवस्था पर सवाल उठाना बंद कर देते है |

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