मोदी उभार : भारतीय राजनीति में paradigm shift

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भारतीय राजनीति

मोदी उभार : भारतीय राजनीति में paradigm shift

पहले २०१४ और फिर २०१९ के चुनाव में बढ़े हुए बहुमत के साथ मोदी का आगमन भारतीय चुनावी राजनीति में गहरे निहितार्थ लिए हुए है | मुख्यधारा की भारतीय विचार परम्परा प्रथमतः तो कांग्रेस के नेतृत्व में उपजी आज़ादी की लड़ाई से पनपी थी , तो दूसरी ओर आज़ादी के बाद चुनावी राजनीति में कम -ज्यादा कांग्रेस समर्थित मुख्या -धारा के वाम विचारको ने इसे आकर दिया था |

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दिलचस्प ये रहा है की संशोधनवादी ‘ मुख्य धारा ‘ को वाम और कांग्रेस के बीच एक अनकहा समझौता था | इस समझोते के तहत ‘ वाम ‘ विचारको .इतिहासकारों और लेखकों को ‘गाँधी और नेहरू को भारतीय स्वतन्त्रा संग्राम में और उसके बाद महत्वपूर्ण स्थान देना था और बदले में कांग्रेस सरकारों को उन्हें ‘ स्पेस ‘ उपलब्ध करना था |क्रांति का रास्ता छोड़ चुके चुनावी राजनीति के गुणा -गणित से लैस वामपंथी पार्टिया और कांग्रेस के बीच के इस समझोते में वैचारिक दिवालियापन , अवसरवाद , दूर -दृष्टि का आभाव और ततकालिकता घुली -मिली हुई थी |

इस मिलाप या खिचड़ी के बहुत सारे प्रभाव रहे जिनमे से एक या दो की चर्चा दिलचस्प होगी |गाँधी -अंबेडकर अंतर्विरोध जगजाहिर है किन्तु आज़ादी के ५० वर्ष बाद तक अंबेडकर भारतीय विचार परम्परा में पृष्ट्भूमि पर ही बने रहे | दूसरा विभाजन के प्रश्न पे इस बौद्धिक परम्परा ने ज्यादातर या कहे की पूर्णतया ही जिन्ना को दोषी ठहरा दिया | गाँधी और नेहरू को बचाने के लिए यदि आलोचना की भी तो वो पटेल कि की|

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मुस्लिम कट्टरता वो दूसरा क्षेत्र था जहा इस गठबंधन कि स्थति बड़ी ढुलमुल रही |सीपीआई ने तो प्रारम्भ में ( स्वतन्त्रा पूर्व ) धर्म के आधार पर देश -विभाजन या पाकिस्तान कि मांग का समर्थन तक कर दिया था | तस्लीमा नसरीन का कलकत्ता छोड़ देना ( कट्टरपन्तियों के भय से ) के साथ -साथ ढेरों उदहारण यहाँ पर मिल जायेंगे |

नेहरू उसके बाद इंदिरा गाँधी के नेतृत्व को समाजवाद का मित्र बताना क्योकि विशेषकर इंदिरा के ज़माने में शीत-युद्ध कालीन दुनिया में इंदिरा की मित्रता संघी सोवियत यूनियन के साथ थी और यहाँ की सीपीआई और जैसी चुनावी वामपंथी दलों को कभी इंदिरा या कांग्रेस प्रगतिशील लगती थी तो कभी प्रतक्रियावादी |

कांग्रेस से इन वामपंथी दलों के अंतर्विरोध का सवाल मुख्य रूप से चुनावी राजनीति का सवाल कई बार ज्यादा लगता है | ९० के दशक तक बंगाल में और केरला में तो आज भी दोनों पार्टिया एक दूसरे की मुख्य प्रतिद्वंदीरही है | वैचारिकी के बजाय ये चुनावी प्रतिद्वंदी दोनों दलों के बीच के अंतर्विरोध का कारण ज्यादा रही है |

जहा तक एक धर्मनिरपेक्ष , लोकतान्त्रिक जनवादी भारत के नैरेसन का प्रश्न है तो उसे निर्मित करने के मामले में कांग्रेस सरकारों और सीपीआई , सी.पी.एम. मार्का राजनैतिक दलों के प्रति सहानभूति रखने वाले दलों के बुद्धिजीवी के बीच एक समझदारी रही है | इस समझदारी की पैदाइश रहा है ‘ भारत का विचार ‘ ( आईडिया ऑफ़ इंडिया ).

इस ‘ भारत का विचार ‘ का प्रमुख बिंदु या क्रक्स(crux) ये रहा है की इस देश में हजारों साल से बिभिन्न धर्मालम्बी , जातिया, सम्प्रदाय , भाषा -भाषी वगरह एक साथ मिलजुल कर रहते आये है |बिना किसी विचारधारा की रौशनी में  देखे तो इस विचार में कोई सामान्य नहीं नजर आती किन्तु ये आज़ाद भारत के नये हुक्मरानो का तो ‘विचार ‘ हो सकता है लेकिन ‘ साम्यवादियों का नहीं ‘|

चूँकि ‘वर्ग संघर्ष ‘साम्यवादी विचारधारा का एक आधार स्तम्भ है |और जैसा की इस विचार -धारा के प्रणेता कार्ल मार्क्स का कहना रहा है कि  अबतक का उल्लिखित इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है | इसलिए भारतीय इतिहास के विभिन्न रूपों को छिपाना या घालमेल करना चुनावी वामवंत के संशोधनवादी रूप को ही दर्शाता है |आश्चर्य की बात तो ये हो जाती है |कि प्रचीन और मध्यकालीन भारत के वर्ग संघर्ष को कई बार ‘दलितवादी’ और ‘अंबेडकरवादी ‘ बुद्धिजीवी सामने लाते है | ये वो बुद्धिजीवी है जिसका विश्वास साम्यवाद विचार परंपरा में कभी नहीं रहा और जो पूंजी के शोषण की तरफ से आँखे मूंदे हुए है |

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