भारत में रहने वाले मुसलमान कितने भारतीय कितने विदेशी ?

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भारतीय मुसलमानो के देशप्रेम , राष्ट्रभक्ति और भारतीयता पर अक्सर ही सवाल उठाते रहे है |वर्तमान में भारतीय मुसलमानो पर प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष्य रूप से भारत के प्रति अपनी निष्ठा साबित करने का दबाव बना ही रहता है | भारत -पाक विभाजन के बाद भारत में रह गये मुसलमानो को, हिन्दुओ का बड़ा तबका पाकिस्तानी समर्थक मानता है |वर्तमान भारत की हिन्दू -मुस्लिम सांप्रदायिक समस्या जितनी आधुनिक है ,उतनी ही इसकी जड़े हमारे इतिहास में भी रही है | वर्तमान भारत में हमे पहले उन तर्कों की जांच -पड़ताल करनी पड़ेगी जिनके आधार पर “हिन्दू सांप्रदायिक”,मुसलमानो को गद्दार और विदेशी करार देते है |

१- इस्लाम एक विदेशी धर्म है (अरब में जन्मा )और मुसलमान विदेशी आक्रमणकारी के रूप में इस देश में आये :-इस्लाम अरब में अस्तित्व में आया इसमें कोई दो राय नहीं और अरब कभी भी भारतीय उपमहाद्वीप का हिस्सा नहीं रहा ये भी सत्य है लेकिन ये तर्क की भारतीय उपमहाद्वीप में जन्म लेने वाले धर्मों को मानने वालो को ही विशुद्ध भारतीय माना जाये , बहुत ही हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण है |

भारतीय बौद्ध धर्म भारत वर्ष में जन्मा | जापानी और थाई लोगों समेत चीनी भी बौद्ध धर्मावलम्बी है |इस वजह से क्या ये मान लिया जाय कि चीनी ,जापानी और थाई लोगों की वफ़ादारी अपने मुल्क के प्रति नहीं है |दूसरी ओर यीशु ने इसाई धर्म का एशिया में प्रसार किया लेकिन इसाई धर्म मुख्यता यूरोप में फला-फुला |इस आधार पर तो सारा -का -सारा योरोपीय महाद्वीप ही एक विदेशी धर्म को मानता है |इस्लाम के मामले में भी बिलकुल यही बात है |इस्लाम का प्रचार अरब प्रायद्वीप से प्रांरभ हुआ जरूर , लेकिन इस्लाम तत्कालीन सभ्य दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में फैला | मोरक्को (पूर्वी अफ्रीका)से इंडोनेशिया (दक्षिण -पूर्व एशिया) तक इस्लाम को मानने वाले मुसलमान एवं मुस्लिम राष्ट्र मिलते है | ये दिलचस्प है की एक मोरक्कोवासी मुसलमान और इंडोनेशियाई मुसलमान के बीच धर्म के सिवा और कोई समानता नहीं | कजाकिस्तान के मुसलमान और अरबी मुसलमान दोनों में ही मात्र धर्म को लेकर ही समानता है |सांस्कृतिक तौर पर दोनों उतने ही अलग है जितना एक कजाई और अरबी को होना चाहिए |

भारत की स्थिति तो और भी रुचिकर है |भारत विभिन्नताओं से भरा हुआ देश है | सांस्कृतिक , भाषाई भिन्नता का प्रभाव यहाँ सभी समुदायों , संप्रदाय में रचा बसा है | बंगाली मुसलमान , पंजाबी मुसलमान से सांस्कृतिक, भाषाई और रूप -रंग के आधार पर उतना ही भिन्न है जितना कि बंगाली हिन्दू ,पंजाबी हिन्दू से है | सांस्कृतिक , भाषाई और रूप -रंग की दृष्टि से बंगाली हिन्दू और मुसलमान और पंजाबी हिन्दू और मुसलमान एक बैठते है |उत्तरप्रदेश के मुसलमान के लिए एक तमिल मुसलमान जितना अनचिन्हा है उतना ही अपरचित मलयाली मुसलमान के लिए एक कश्मीरी मुसलमान है |जब देश के भीतर ही मुसलमानो के बीच इतनी विभिन्नता है तो विदेशी मुसलमानो के साथ तो किसी प्रकार की समानता की तुलना ही क्या की जा सकती है|

३-भारत की पहली मस्जिद किसी मुस्लिम आक्रमणकारी ने नहीं बल्कि केरला के हिन्दू राजा जमोरिन ने बनवायी थी।भारत के पहले मुसलमान जो “मोपिल्ला” कहलाये ,वो भी अपनी स्वेक्षा से तत्कालीन केरल के हिंदू राजा के राज्य में बिना किसी दबाव के अरबो के हमले से बहुत पहले मुसलमान हुए ।

फिर भी भारत में इस्लाम , धर्म के रूप में प्रभावी तौर पर तुर्क आक्रमणकारी और मुगल हमलवारों के साथ ही आया | “मुसलमान भारत में आक्रमणकारी के रूप में ही आये” ये उद्बोधन एक जटिल प्रक्रिया को सरलीकृत करने का प्रयास है।तुर्क और मुग़ल राजघरानो ने लम्बे काल तक हिंदुस्तान पे हुकूमत की, ये एक तथ्य है |हिन्दू मंदिरों को तुर्क , अफगान और मुगल हमलावरों द्वारा तोड़ा जाना ये भी ऐतिहासिक तथ्य है |महमूद गजनी से लेकर अहमद शाह अब्दाली तक मुस्लिम हमलावरो ने हिन्दू राजघरानो के विरुद्ध युद्ध को काफिरों के विरुद्ध जेहाद का नाम दिया ये भी ऐतिहासिक सत्य है |कई बार इस्लाम के प्रसार के लिए तुर्क , मुगलों ने कुछ जगह पे जोर -जबरदस्ती और लालच का सहारा भी लिया |फिर भी भारत में इस्लाम मुख्यतः और प्रधानतः तलवार के दम पर नहीं फैला |हिन्दुओं में वर्ण व्यवस्था के शोषण और उत्पीड़न के साथ-साथ सूफियों की भूमिका हिंदुओ के बीच इस्लाम के प्रसार में बहुत ही प्रभावी रही है |भारी संख्या में वर्ण व्यवस्था और जातिवाद से पीड़ित जनमानस को इस्लाम में मुक्ति की रौशनी दिखाई दी |

ध्यान रहे इस्लाम में जातिगत भेदभाव की मनाही है | कहते है हिन्दू धर्म दुनिया का एक मात्र ऐसा धर्म है जो अपने मानने वालों के साथ यानि अछूतों के साथ जानवरों से भी बदत्तर व्यवहार करता रहा है |ऐसा भी नहीं है की छुआ-छूत कुरीति के रूप में हो | छुआ -छूत , भेदभाव को ब्राह्मण ग्रंथों और स्मृतियो में बाकायदा लिपिबद्ध और संस्था बद्ध किया गया है |बजाए इसके कि हिन्दू पुनरुथानवादी , अमानवीय वर्ण -व्यवस्था और जातिगत भेदभाव को अपनी कूपमंडूकता के रूप में अपनी कमजोरियों के तौर पर देखते , उन्होंने वर्तमान के अपने राजनैतिक हितों के हिसाब से भारत के आम मुसलमानो को ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया है |

भारतीय इस तरह के कूपमंडूकों के लिए अलबरूनी का ये कथन बहुत महत्वपूर्ण है |

“हिन्दू समझते है की उनके देश जैसा कोई देश नहीं है उनके जाति जैसी कोई जाति नहीं और उनके धर्म जैसा कोई धर्म नहीं………….

अगर वो बाहर निकले और दुनिया को देखे तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हो जायेगा ……

जबकि हिन्दुओं के पूर्वज ऐसा नहीं सोचते थे”

सच तो ये है की अरबों ,तुर्कों के आक्रमण से बहुत पहले से ही हिन्दू -कुश के दर्रो से भारत पे हमले होते रहे है मध्य एशियाई शको का हमला हो या सिथि यनो का हो या हुणो का हो |यहाँ तक की सिन्धुं और गंगा के मैदानों में आर्यो का आगमन भी मध्य एशिया से १५०० ईसा पूर्व माना जाता है |

फ़िराक गोरखपुरी इसीलिए कहा करते थे की ” कारवां बसते गए , हिंदुस्तान बनता गया ”

वास्तव में मानव सभ्यता का संपूर्ण इतिहास स्थानान्तरण से भरा पड़ा है | वैज्ञानिक , मानव का आदि निवास स्थान अफ्रीका महाद्वीप को मानते है लेकिन आज मानव प्रजाति पूरी दुनिया में फैली हुई है |आर्य, शक ,तुर्क मंगोल वगैरह दुनिया के विशेष हिस्सों मे उद्भूत हुए और बाद में दुनिया के दूसरे हिस्सों में फ़ैल कर खप गये | वर्तमान के संकुचित अन्धराष्ट्र्वादी नजरिये से देखने पर मानव इतिहास की गति को नहीं समझा जा सकता |मानव सभ्यता के इतिहास की समझ तो, पूर्वाग्रह रहित एक वैज्ञानिक और विहंगम दृष्टि से ही पैदा की जा सकती है |

भारतीय मुसलमानो ने देश को बांटा(भारत -पाक)-वर्तमान में भारत में रहने वाले मुसलमान पाकिस्तान परस्त है :-

दुनिया आज राष्ट्र -राज्यों में बंटी हुई है | राष्ट्र -राज्य यूरोप में पुनर्जागरण के उत्तरार्ध में अस्तित्व में आने लगे , तो उपनिवेशीकृत मुल्को, जैसे भारत में, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आकार ग्रहण करने लगे |शासन के प्रतिनिधि मूलक रूप ने, आधुनिक राष्ट्रों के जातीय भाषाई अल्पसंख्यकों के मन में हासिये पे चले जाने का भय पैदा कर दिया स्वतन्त्रा पूर्व ,भारतीयउपमहाद्वीप का उच्चवर्गीय मुसलमान भी अपने अल्पसंख्यक होने के कारण भयग्रस्त रहा है |

अब्दुल कलम आजाद ने इस परिस्थिति के बारे में कहा है कि ” मुसलमान मुर्ख थे जो उन्होंने हिन्दुओं से सुरक्षा की गारंटी मांगी और हिन्दू उससे भी बड़े मुर्ख थे जो उन्होने उसे देने से मना कर दिया |”

सम्पूर्ण औपनिवेशिक काल में मुस्लिम राष्ट्रीयता का उभार दो तरफ़ा खिचाव और द्वन्द का शिकार रहा |भारतीय “मुस्लिम राष्ट्रीयता और सम्प्रदवाद” के मुख्य कबि सर इकबाल एक ओर ” सारेे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिता हमारा ” लिखते है तो दूसरी ओर ” जवाब ए शिकवा में ” इश्के हिंदुस्तान में बरहमन भी हुए ” लिखते है |

भारतीय मुसलमान जिनके खानदानो ने हिंदुस्तान पे हुकूमत की थी -के द्वन्द इकबाल में मूर्तमान होते है | प्रांरभ के “धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी” जिन्ना का हिन्दू और मुसलमान के रूप में दो राष्ट्र सिद्धांत (टू नेशन थ्योरी ) को जन्म देना भी मुसलमानो के भीतर अंतर्विरोध को ही दिखाता है। पूरे आधुनिक विश्व में जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यको की साम्प्रदायिकता अलगाववाद की ओर जाती है और भारत की मुस्लिम साम्प्रदायिकता भी इसका अपवाद नही थी । हिन्दुओं की हमेशा की गुलामी ( क्योंकि हिन्दू हमेशा ही बहुसंख्क होंगे ) से बचने के लिए जिन्ना ने मुसलमानो से पाकिस्तान बनाने का आह्वान किया |

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लेकिन जिन्ना ये भूल गए कि संप्रदाय कभी भी राष्ट्र की जगह नहीं ले सकता |१९७१ तक आते -आते बंगाली राष्ट्रीयता ने खुद को पाकिस्तान से अलग कर लिया |पूर्वी पाकिस्तान का नाम बांग्लादेश हो गया और इस्लाम दो राष्ट्रीयताओं को एक सूत्र में नहीं बांध पाया |

आज पाकिस्तान एक असफल राष्ट्र होने की ओर बढ़ रहा है |नज़रिया -ए – पाकिस्तान मे उसकी पहचान का संकट (identity crisis ) साफ़ दिखाई देता है |धर्म के आधार पर बना राष्ट्र किसके करीब है , अरबों के ?(क्योकि वो इस्लाम को मानने वाले है ) या उत्तर भारतीयों के ?

क्योंकिक ( पंजाब , सिंध ,राजस्थान आदि ) एक तरह की संस्कृति है | इस प्रश्न का उत्तर आज भी पाकिस्तान के पास नहीं है |

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