वास्तविक दुनिया ( Real world )को बदलती आभासी दुनिया ( virtual world )-

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वास्तविक दुनिया

कहते है ‘ दुनिया तो वास्तविक ही है, और जो आभासी प्रतीत होता है वो मात्र इस वास्तविक दुनिया का प्रतिविबन है ‘| कहने का अर्थ ये  कि ‘ आभासी दुनिया ‘ वास्तविक दुनिया का ‘ सुसंगत ‘ या ‘असंगत ‘  ‘प्रतिबिंबन ‘(reflection ) होती  है | ये तो दुनिया और चिंतन का सामान्य सम्बन्ध  रहा किन्तु यहाँ  आभासी दुनिया से अर्थ इंटरनेट ( internet ) की दुनिया से है | सामान्य अर्थ में आजकल इंटरनेट की दुनिया को ही आभासी दुनिया के रूप में लिया जाता है | covid -19  महामारी के पहले भी इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या में तेज़ी से इज़ाफ़ा हो रहा था और इस महामारी के दौरान तो इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या और उनका समय अंतराल दोनों में जबरदस्त वृद्धि हुई है |

चीन जैसे बंद समाज को भी -जहाँ फेसबुक , ट्विटर , यूट्यूब , इंस्टा ……वैगरह प्रतिबंधित है , – वैकल्पिक  सोशल साइट्स की व्यवस्था करनी पड़ी है |वहाँ फेसबुक जैसा we chat है तो  ट्विटर जैसा Sina weibo , insta हो जाता है  tancent Q Q और टिंडर की तरह है मोमो लिस्ट लम्बी है | कहने का मतलब ये है की आज के दौर में , चीन जैसा संकुचित और बंद समाज भी ‘ आभासी दुनिया ‘ की महिमा से अपने आप को अलग नहीं रख पाया है |

वास्तविक दुनिया (2)

ज्ञान और सूचनाओं तक पहुंच का प्रश्न सम्पूर्ण आधुनिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजनैतिक -दार्शनिक प्रश्न रहा है | छापेखाने के अविष्कार से पहले संगठित ज्ञान पर , -चाहे वो कितना  ही आदिम और पिछड़ा था – अल्पसंख्यक  प्रभु वर्गों का ही एकधिकार था | बात यहीं तक सीमित न थी , सम्पूर्ण मध्य काल में धार्मिक , भाषाई , आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान भी कुछ सत्ताधारी  तबकों तक सीमित था | छापे -खानो के अविष्कार ने ज्ञान और सूचनाओं को सर्वप्रथम प्रभु वर्गों की क़ैद से मुक्त कर उभरते हुए ‘ मध्य वर्गों ‘ के लिए यूरोप में सुलभ किया | हमारे अपने देश में भी आधुनिक शिक्षा का प्रसार , स्कूल -कॉलेज , समाचार पत्र – पत्रिकाओं के प्रसार में छापे खानो का अद्वितीय योगदान रहा |

 

वास्तविक दुनिया (3)

18 वी , 19 वी  और सम्पूर्ण 20 वी  शताब्दी में जनवादी आंदोलनों के विस्तार और आम जन के सशक्तिकरण और जनता की राजनीती में बढ़ती भागीदारी का एक मुख्य कारण मिडिया (print ) द्वारा जनता तक सूचनाओं और ज्ञान को पहुँचाना भी रहा है | किन्तु इस पुराने मीडिया ( प्रिंट और टीवी ) की एक सीमा है और वो है इसका ‘ one way communication ‘ मतलब ख़बरों और सूचनाओं पर सरकार , कारपोरेट मीडिया घरानो का कमोबेस एकाधिकार | मतलन खबरों , सूचनाओं को नियंत्रित और निर्देशित करना |

21 वी  सदी की सुचना क्रांति ने इस ‘एक तरफ़ा सुचना प्रसार ‘ को तोड़ डाला है | अब आम जनता के पास भी वो हथियार है जिसके बल पर वो स्वयं को व्यक्त कर सकती है , सूचनाओं और ज्ञान प्रसारित कर सकती है  वैगरह -२ | समाज और सत्ता के जनवादीकरण(democratization ) में इस क्रांति ( सूचना) की भूमिका  है | चाहे आज के अमेरिका में ‘ black lives Matter ‘ अभियान ( कम्पैन ) हो या भारत में 2012 का निर्भया आंदोलन , वर्चुअल  वर्ल्ड ने इनमे अपनी एक निर्णायक भूमिका निभाई है |

भारत में तो जाति, वर्ग , लैंगिकता के आधार पर हाशिये पर ढकेले गये वर्गों की आवाज भी कारपोरेट मीडिया में हाशिये पर चिपका दी जाती थी, किन्तु सोशल -साइट्स ने इन कमजोर तबकों को वैकल्पिक आवाज देकर समाज के जनतंत्रीकरण  को बढ़ाया ही है | हां , ये सच है कि समाज के प्रतिक्रियावादी तबकों को भी अपने विचारों को विस्तारित करने का एक प्लेटफॉर्म मिला है लेकिन अव्वल तो प्रतिक्रिया और प्रगति के बीच संघर्ष में अंतत प्रगति प्रतिक्रिया को बिस्थापित कर ही देती है और दूसरा , प्रतिक्रिया समाजके अल्पसंखयक , साधन सम्पन्य और शोषक तबकों का प्रतिनिधित्व करती है | जिससे देर -सवेरे सारे समाज का हित टकराने लगता है | और इसी वजह से ये प्रतिक्रियावादी वर्ग और विचारधारायें इतिहास के कुड़ेपन में फेक दी जाती है |

वास्तविक दुनिया (4)

बाजार अर्थव्यवस्था के इस दौर में जब ये कहा जाता है कि ” there is no free lunch ” तो कुछ लोग ये सवाल करते है कि कैसे सोशल साइट्स मुफ्त में उपलब्ध हो सकती है | उनके हिसाब से इसका मतलब सीधा -सीधा ये है कि ‘ अगर आप कोई उत्पाद मुफ्त में पा रहे हैं तो आप स्वयं एक उत्पाद है ( if you are using a free product then you are a product ).हालांकि ये व्याख्या कमोबेश उचित हो सकती है, किन्तु सामाजिक गतिकी को बाजार न इतिहास में पूरी तरह से नियंत्रित करने में सफल रहा है न भविष्य में ऐसा कर सकता  है |

वास्तविक दुनिया (5)

बाकि , सेल्फी कल्चर , व्यक्तिवाद  ( individualism ) आत्मा श्लघा ( self promotion ) , फेसबुक vs फ़ेकबुक , छदम आत्मा छवि गड़ना , फेसबुकिया एक्टिविस्ट जैसी विमारियों कि बात, तो उसका दोष पूर्णतया इन सोशल साइट्स पर नहीं मढ़ा जा सकता | इसकी बड़ी जिम्मेदार समाज को तो लेनी ही पड़ेगी | क्या हमारे समाज में आत्मा श्लघा या आत्म प्रशंशा का संस्कार पहले से मौजूद नहीं रहा है ? क्या आम तौर पर लोग बातचीत के दौरान अपनी प्रशंशा और दूसरों कि निंदा नहीं करते रहते हैं ?

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