वीरे दी वेडिंग ( वीर नदारद बस वेडिंग ) फिल्म समीक्षा

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‘ वीरे दी वेडिंग ‘फिल्म

महिला केंद्रित फिल्मो के फैशन के दौर में एक नयी फिल्मवीरे दी वेडिंग ‘ चर्चा में रही |पिछ्ले कुछ वर्षों से कई महिला केंद्रित फिल्मों न केवल आई है बल्कि उनमे से कुछ काफी उल्लेखनीय भी रही है | पिंक तो काफी चर्चित रही|महिला केंद्रित फिल्मों को बनाने का एकाएक बाढ़ आ जाना और उसमे भी महिला सेक्सुलिटी की प्रधानता का होना निश्चित तौर पर गहरे निहितार्थ लिए हुए है | बाजार की शक्तियां और हमारे समाज में हो रहा बदलाव ये दो पहलु ऐसे है जिन्होंने स्त्री केंद्रित मुद्दों को मुख्या धारा सीनेमा में स्थान दिया है | किसी मुद्दे को उठाकर फिल्म बनाना क्योकि वो फैशन में एक बात है |और उस मुद्दें के साथ न्याय करना सर्वथा दूसरी बात है |‘ वीरे दी वेडिंग ‘ भी एक गंभीर मुद्दे पर बनी सतही फिल्म ही है |

किसी भी फिल्म में कहानी उसका मुख्या भाग होता है लेकिन इस फिल्म में कहानी नाम की कोई चीज नहीं है | ऊपरी तबके की चार महिलाये की दोस्ती को आधार बनाकर बनायीं गई ये फिल्म मात्र ( रिलेशन ऑफ़ क्राइसिस ) के इर्द -गिर्द ही घूमती दिखी |

फिल्म की मुख्य नायिका (करीना ) अपने प्रेमी के साथ शादी करे या न करे इस दुंद में रहती है , क्योकि उसके माँ -बाप की शादी उतनी सफल नहीं रही थी |

‘ वीरे दी वेडिंग ‘ allgyan फिल्महालाँकि अंतत शादी हो जाती है लेकिन हर बॉलीवुड फिल्म की तरह विवाह पश्चात के जीवन से ये भी पलायन कर जाती है|

फिल्म की दूसरी नायिका जिसके माँ -बाप उसकी तुरंत शादी कर देते है , अपने पति से अलग अपने माँ -बाप के यहाँ रह रही है |ये ( स्वरा ) अपने पती दवरा घरेलू उत्पीड़न का शिकार रही है | इसका पती इसे छोड़ने के बाद इसे ब्लैकमेल करता है और ब्लैकमेलिंग की वजह इसका हस्तमैथुन करना है |

तीसरी नायिका ने एक गोरे से शादी कर ली है | जिसकी वजह से उसका परिवार उससे नाराज हो गया है |

चौथी नायिका (सोनम कपूर ) डेस्पेरेटली प्रेमी की तलाश में है लेकिन साथ -ही साथ उतनी ही कंफ्यूज भी है |

नायिकाओं के मुँह से दू अर्थी सवादों मर्दवादी शव्दावली को महिलाओं के मुँह से बुलवाना जैसे “ सीधे चढ़ जा “ और यू डोंट हैवे बॉल्स “ वगैरह | हस्तमैथुन का दृश्य और सोनम के किसी बिना लड़के का नाम जाने , सेक्स करना ये सब कुछ वो बोल्ड मसाला और तड़का है जो फिल्म चलाने के लिए भरा जाता है |

‘ वीरे दी वेडिंग ‘फिल्मप्रगतिशीलता और बोल्डनेस के आवरण में लिपटी ये फिल्म महिलाओं से संबंधित डोग्मा को या डॉग्मैटिक एप्रोच को ही (एंडोर्स) स्थापित करती है |

‘ महिलाओं की दुनिया प्रेम , विवाह , घर परिवार तक ही सीमित होती है और यही सब कुछ उनके सुख -दुःख यहाँ तक की जीवन की सार्थकता को भी तय करते है |’

उपरोक्त संकुचित और रूढ़िवादी अप्प्रोच को ही ये पूरी फिल्म स्थापित करती है |

बोल्डनेस को महिलाओं के सन्दर्भ में छोटे कपड़ों ,सेक्स , नारी विरोधी गतियों , और दू अर्थी सवांदों तक निम्न (डीग्रेड) कर देना बाजार का ही तो कमाल है | सही भी है अगर सुरजनाक्तमता(क्रेटिविटी) नहीं है और फटा-फट मुनाफा भी कमाना है तो महिला केंद्रित फिल्म सेक्सुअल बोल्डनेस के बिना बन ही कैसे सकती है |

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