संगीत: आखिर ये आया कहा से –

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संगीत

संगीत और प्रकृति का जुड़ाव एक है –

संगीत से जिससे आशय ये है की इसमें गाना, नाचना , और बजाना आता है |जब भी लगता है की समाज बना या कहे हम एक व्यस्थित जीवन जीने योग्य हुए | तभी से संगीत हमने महसूस किया | क्योकि संगीत तो मौजूद था ही जब से प्रकृति बनी |क्योकि सभी पक्षी जो भी ध्वनि करते है वो भी एक प्रकार का संगीत ही है |जैसे ‘कोयल की कू और मोर भी आवाज करता और मेढक भी ध्वनि निकालता है |जैसा मेरा सोचना है हमारे कान जो बने है वो एक तरह से ध्वनि सुनने के लिए ही बने है |अब ध्वनि में अगर करकस ध्वनि है जो हमारे कानो को सुकून नहीं देती है तो उसे नहीं म्यूजिक मानते है और जो हमारे कान को अच्छा महसूस कराती है |उसे ही संगीत कहा जाता है |

म्यूजिक के सबसे पहले कहा मिले साक्ष्य –

भारत संगीत के मामले में बहुत समृद्ध रहे है |संगीत का प्रारम्भ सिंधु घाटी की सभ्यता के काल में हुआ हालांकि इस दावे के एकमात्र साक्ष्य हैं उस समय की एक नृत्य बाला की मुद्रा में कांस्य मूर्ति और नृत्य, नाटक और संगीत के देवता की पूजा का प्रचलन। सिंधु घाटी की सभ्यता के पतन के पश्चात् वैदिक म्यूजिक की अवस्था का प्रारम्भ हुआ जिसमें म्यूजिक की शैली में भजनों और मंत्रों के उच्चारण से ईश्वर की पूजा और अर्चना की जाती थी।रही बात म्यूजिक वर्ड जो आया वो ग्रीक वर्ड -मौसीके से बना है ये ग्रीक के लोगों के नाइन मोसेस थे जो वो अपने देवता को खुश करने के लिए प्रयोग करते थे |

संगीतसबसे प्राचीन ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में संगीत को कैसे दी जगह –

मनुष्य ने अपने विकास कर्म में भाषा का सहारा लिया |और जीवन को अधिक आनंदमय बनाने के लिए संगीत जैसे तत्त्व की खोज की |वैदिक युग में ‘म्यूजिक ’ समाज में स्थान बना चुका था। सबसे प्राचीन ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में आर्यो के आमोद-प्रमोद का मुख्य साधन संगीत को बताया गया है। अनेक वाद्यों का आविष्कार भी ऋग्वेद के समय में बताया जाता है।

सामवेद से निकले सात स्वर –

संगीत‘यजुर्वेद’ में संगीत को अनेक लोगों की आजीविका का साधन बताया गया, फिर गान प्रधान वेद ‘सामवेद’ आया, जिसे संगीत का मूल ग्रन्थ माना गया।सामवेद में हमारे मुनियों ने उच्चारण की दृष्टि तीन और संगीत की दृष्टि से 7 स्वर दिए |उस समय “स्वर” को “यम” कहते थे। साम का संगीत से इतना घनिष्ठ संबंध था कि साम को स्वर का पर्याय समझने लग गए थे। छांदोग्योपनिषद् में यह बात प्रश्नोत्तर के रूप में स्पष्ट की गई है। सामवेद’ का गान (सामगान) मेसोपोटामिया, फैल्डिया, अक्कड़, सुमेर, बवेरु, असुर, सुर, यरुशलम, ईरान, अरब, फिनिशिया व मिस्र के धार्मिक संगीत से पर्याप्त मात्रा में मिलता-जुलता था।

रामायण और महाभारत में भी संगीत देखने मिला –

उतर वैदिक काल में रामायण और महाभारत में भी संगीत बहुत वर्णन मिला |तो ‘महाभारत’ में कृष्ण की बाँसुरी के जादुई प्रभाव से सभी प्रभावित होते हैं| चौथी शताब्दी में भरत मुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ के छ: अध्यायों में संगीत पर ही चर्चा की। इनमें विभिन्न वाद्यों का वर्णन, उनकी उत्पत्ति, उन्हें बजाने के तरीकों, स्वर, छन्द, लय व विभिन्न कालों के बारे में विस्तार से लिखा गया है। इस ग्रन्थ में भरत मुनि ने गायकों और वादकों के गुणों और दोषों पर भी खुलकर लिखा है।

संगीतबाद में छ: राग ‘भैरव’, ‘हिंडोल’, ‘कैशिक’, ‘दीपक’, ‘श्रीराग’ और ‘मेध’ प्रचार में आये। पाँचवीं शताब्दी के आसपास मतंग मुनि द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ ‘वृहददेशी’ से पता चलता है कि उस समय तक लोग रागों के बारे में जानने लगे थे। लोगों द्वारा गाये-बजाये जाने वाले रागों को मतंग मुनि ने देशी राग कहा और देशी रागों के नियमों को समझाने हेतु ‘वृहद्देशी’ ग्रन्थ की रचना की।

 हमारे अध्याध्मिक और सांस्कृतिक सहयोगी –

संगीत मानव जीवन को मधुर बनाता है |संगीत जीवन के हिर्दय को धैर्य रखना भी सिखाता है |इसका वास्तविक प्रभाव अनंत है |यदि व्यापक दृष्टि से देखे तो संगीत पूरी दुनिया में व्याप्त है |आज़ादी की लड़ाई में भी उस दौर के स्वतंत्रता के गीत लिखे गए और गाये गाये |संगीत जहाँ हमारे अध्याध्मिक और सांस्कृतिक सहयोगी भी है | और हमारे अंदर उत्साह भी बढ़ाता है |चिकित्सा के क्षेत्र में भी संगीत को बहुत महत्व दिया है |कई ऐसे रोग है जिसमे मरीज़ जो संगीत के प्रभाव से बहुत अच्छे हुए |

संगीत और मुगलों का शासन –

ग्यारहवीं शताब्दी में मुसलमान अपने साथ फारस का संगीत लाए। उनकी और हमारी संगीत पद्धतियों के मेल से भारतीय संगीत में काफी बदलाव आया। उस दौर के राजा-महाराजा भी म्यूजिक-कला के प्रेमी थे और दूसरे संगीतज्ञों को आश्रय देकर उनकी कला को निखारने-सँवारने में मदद करते थे। बादशाह अकबर के दरबार में 36 संगीतज्ञ थे।उसी दौर के तानसेन, बैजूबावरा, रामदास व तानरंग खाँ के नाम आज भी चर्चित हैं। जहाँगीर के दरबार में खुर्रमदाद, मक्खू, छत्तर खाँ व विलास खाँ नामक संगीतज्ञ थे। कहा जाता है कि शाहजहाँ तो खुद भी अच्छा गाते थे और गायकों को सोने-चाँदी के सिक्कों से तौलवाकर ईनाम दिया करते थे। मुगलवंश के एक और बादशाह मुहम्मदशाह रंगीले का नाम तो कई पुराने गीतों में आज भी मिलता है।

बदलता संगीत और समाज –

संगीतलेकिन धीरे -धीरे संगीत में भी बदलाव आये |क्योकि म्यूजिक भी आपका समाज से ही आता है |राज्यतंत्र भी ख़तम हुआ और कई देशों में लोकतंत्र आया है | फिर धीरे -धीरे पॉप म्यूजिक का भी विकास हुआ |जो इस समय भी जारी है | म्यूजिक बदला -सुनने वाले लोग बदले | हमारे बस उद्देश्य ये था की आपको संगीत के उदय के बारे जो भी जानकारिया है वो दे सके | क्योकि संगीत एक ऐसा टॉपिक है जिससे बात शुरू हो जाये तो खत्म करना नामुमकिन ही है |हमरी कोशिश ये रहती है की आपको संगीत और समाज के बारे में अलग नजरिया व्यक्त करने लायक बना सके |

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