सुशांत ‘ आत्महत्या ‘ : फिल्म उद्योग ,व्यवस्था और भारतीय समाज –

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सुशांत आत्महत्या

सुशांत ‘ आत्महत्या ‘ :भारतीय समाज  –

सुशांत की ‘आत्महत्या’के बाद फिल्म उद्योग और भारतीय समाज के भीतर भाई -भतीजावाद मठाधीशी वैगरह को लेकर बहस तेज़ हो गई है | अब से पहले तक फिल्म उद्योग और उनके सितारों की छवियाँ जिस तरह बनाई जाती थी , और इनको आम जनमानस के सामने जैसे प्रस्तुत किया जाता था , वो ऐसा था जैसा उन्होंने फिल्मो में किरदार निभाया होता था | वर्तमान बहस जो आजकल आभासी दुनिया में चल रही है , निश्चित तौर पर अभिनेताओं -अभिनेत्रियों की छवियों को तोड़ने वाली दिख पड़ती है |

सिनेमा हमेशा से मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम रहा है | अँधेरे -सिनेमा हाल में , बड़े पर्दे पर ध्वनि के जबर्दस्त प्रयोग के माध्यम से , सिनेमा सैकड़ों दर्शकों के बीच भी प्रत्येक दर्शक के साथ वन टू वन (one to one ) सम्बध स्थापित करने में सक्षम होता है |इस वन टू वन सम्बध की वजह से सिनेमा के नायक -नायिका दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ने में सफल रहते है |दृश्यों व् ध्वनियों के माध्यम से सिनेमा कहानी को मानों घटनाओं के प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से जीवित ही कर देता है |

क्या सिनेमा -टी वी और सोशल मीडिया मनोरंजन के तीन ही माध्यम बचे है ?

दुनिया की सबसे बड़ी गरीब , कुपोषित और पिछड़ी आबादी वाले भारत देश में , दुनिया की सबसे ज्यादा फिल्मे बनायीं जाती है | हमारे समाज में अच्छा -खासा सिनेमा कल्चर विद्यमान है | मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम हमारे यहाँ सिनेमा ही है | कभी -कभी तो ऐसा लगता है मानों सिनेमा -टीवी और आज के समय में सोशल मिडिया , ये तीन माध्यम ही मात्र मनोरंजन के रूप में हमारे पास बचे हुए है |

सुशांत आत्महत्या (2)ये हमारे समाज की एक विडंबना ही है , कि सिनेमा , टी वी, इंटरनेट के आलावा हमारे पास मनोरंजन के दूसरे संशाधन ही नहीं रह गये | खेलों की दशा देखी जाय दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश का हाल बुरा नहीं दयनीय है | पदकों से जनसँख्या के अनुपात में भारत सर्वाधिक निचले पायदान पर है | कोर्स के आलावा पढाई -लिखाई की कोई संस्कृति नहीं बची है | नौकरी कैरयर के लिए जो पढ़ना पढ़े पढ़ा जाय बाकी कुछ रचनात्मक पढ़ाई -लिखाई से क्या लाभ ?जैसे तर्क मध्यम वर्गों में अक्सर बाँचे जाते है |

रहा सवाल मनोरंजन के पारम्परिक तौर -तरीकों का तो वैसे भी आधुनिक युग की गति के साथ ना वो तालमेल बिठा सकते थे ना ही बिठा पाये| पैसे भी खेल -कूद के लिए आधारभूत सुविधाओं ( मैदान , किट वैगरह ) और अच्छी खुराक की आवश्यक होती है , और जहाँ तक़रीबन आधी आबादी दो जून की रोटी के लिए अजमाल हो वहाँ सस्ते , चलताऊ सिनेमा के अलावा विकल्प ही क्या रह जाता है |

मनोरंजन के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती-

इस परिस्थति में , कहे कि इस निर्वात को हिंदी प्रदेशों में बॉलीवुडिया मशाला सिनेमा अपना घटिया मनोरंजन परोस कर भरता रहा है |मनोरंजन के बिना तो मानवीय जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है चाहे वो मनोरंजन कितना भी घटिया और व्यक्ति को मनोरोगी बनाने वाला क्यों न हो | यहि वो कारण है जो घटिया फिल्मो और अभिनेता -अभिनेत्रियों को हमारे समाज में अतीव लोकप्रिय बनाता है |

सुशांत आत्महत्या (3)

बॉलीवुडिया फ़िल्मी नायकों और लंपट चरित्र में तो अक्सर ही भेद करना मुश्किल हो जाता है | फिल्मो में नायकों की भाव -भगिमा , चलने , उठने -बैठने के ढंग , कई बार दिउ : अर्थी सवांद , ड्रेस -अप वैगरह के साथ महिलाओं ( नायिका ) के साथ रोमांश या सवांद का तरीका हल्के -चरित्र वाले लंपट व्यक्ति की तरह दिखाई देता है | अक्सर (खासकर 70 , 80 ,90 ) के दशक की फिल्मो के नायक , नायिका खुलेआम छेड़ते थे और दर्शकों को वही रोमांश लगता था | इस पूरी प्रक्रिया में फिल्म -इंडस्ट्री का तो लम्पटीकरण को भी बढ़ावा दिया |

सुशांत आत्महत्या (4)कोई भी सामाजिक निकाय या संस्था चूकि समाज से ही बनती है , तो उसमे भी समाज का प्रतिविबन लाज़मी है | भाई -भतीजावाद , वंशवाद , जातिवाद , वर्ग , मठाधीशी, वर्चस्य की चाहत , ये सबकुछ हमारे समाज की विशेषताये है | और फिल्म उद्योग तथा नायक -नायिका इससे भिन्न्य नहीं है | कहते भी है कि ” व्यक्ति का कोई चरित्र नहीं होता सत्ता का चरित्र होता है |”

समाज का सांस्कृतिक खालीपन –

सुशांत की आत्महत्या को इस पुरे सन्दर्भ में ही देखा जाना चाहिए | बाजार व्यवस्था और पूंजीवाद के पास कलात्मक तौर पर या सृजन और सकारात्मक के लिए कुछ विशेष बचा ही नहीं है | अपने वर्चस्य और ताकत को बढ़ाने -बचाने के लिए अगर बॉलीवुडिया मठाधीशों ने सुशांत को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दिया तो इसका सबसे बड़ा दोष पूरी की पूरी व्यवस्था और हमारे स्थिति को जाता है |

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सूचना क्रांति से हुए सूचना विस्तार ने आम -जनमानस का सशक्तिकरण तो किया ही है | इसका प्रभाव ये है कि आम लोगों ने खुलकर बॉलीवुड के भाई -भतिजावाद और groupism के विरुद्ध अपना रोष डटकर जाहिर किया है | ये विरोध और रोष इतना ज्यादा है कि मठाधीशों की PR एजेंसी भी उनकी अलोकप्रियता (बढ़ती ) को आवेशविहीन नहीं कर पा रही है | सही भी है आखिर इन्ही आम -लोगों का बॉलीवुड और इसके मठाधीशों ने सेक्स , रोमांश और हिंसा का सहारा लेकर वर्षों शोषण किया है |और आप भी कर रहे है |

बाकी वर्तमान में हो रही हलचल का कितना दूरगामी परिणाम होगा ये तो इस बात पर निर्भर करेगा कि हमारा समाज स्वयं में कितना बदला है ? क्या Millennial इस परिवर्तन के वाहक होंगे , ये देखने की बात होगी |

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