CBSE के तहत 100 % अंक पाने वाले और शिक्षा व्यवस्था का चरित्र –

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CBSE के तहत 100 % अंक -क्या माना जाये हो रहा है गुणात्मक परिवर्तन-

CBSE बोर्ड के दसवीं और १२वी के रिजल्ट घोषित हुए 12 वी एक छात्रा ने पुरे में पुरे अंक प्राप्त किये मने 500 /500 ! बात यही तक नहीं रुकी इस बार CBSE के 1 ,5 7 ,93 4 छात्रों को बारहवीं की परीक्षा में 90 % से ज्यादा अंक मिले | पिछले वर्ष से इस वर्ष 90 % से अधिक अंक पाने वालों की संख्या में 65 % से अधिक की वृद्धि हुई है | चौकाने वाला तथ्य तो ये है की 2008 में 95 % से ज्यादा अंक पाने वाले की संख्या 500 से भी कम हुआ करती थी किन्तु अब ये संख्या 3800 से ज्यादा हो चुकी है |

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इन आकड़ों पर जाये तो ऐसा लगता है , कि मानों शिक्षा व्यवस्था में गुणात्मक परिवर्तन आ रहा है | छात्रों कि विषयों के प्रति समझदारी व्यापक और गहन हो रही है| उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसा ही हो ! किन्तु दूसरे तरह के वक्तव्य व् आंकड़े है
जो कुछ और कहानी कहते है | दुनिया भर के नामी और बेहतरीन शोध -संस्थान भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर तंज कसते ही रहते है | दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश , प्राथमिक , माध्यमिक शिक्षा तंत्र का जाल बिछाने के बाद भी गुणवत्तापूर्ण और मौलिकता को प्रोत्साहित करने वाली शिक्षा उपलब्ध कराने के मामले में इतना पीछे कैसे हो सकता है ?

भारत में प्राथमिक व् माध्यमिक स्तर पर शिक्षा व्यवस्था की विभिन्न्य चुनौतियां –

भारत में प्राथमिक व् माध्यमिक स्तर पर शिक्षा व्यवस्था विभिन्न्य चुनौतियों से दरपेश है | पहली चुनौती तो इसके सामने अपने दोहरे -तिहरे मयार के कारण है | गरीब आबादी के लिए मध्याहन (MOM ) भोजन वाले सरकारी स्कूल जहाँ सरकार बच्चों को बुनियादी शिक्षा देकर साक्षर बनाने का प्रयास करती है | इसका लक्ष्य ही बच्चों को सामान्य जोड़ -घटाना-गुणा-भाग और पढ़ना -लिखना सिखाने पर होता है | व्यवस्था और जनता दोनों ही जानते है कि ये आबादी साक्षर होकर भारत के श्रम बाजार का हिस्सा ही बनेगी न की उच्य शिक्षा में अपना योगदान देगी |

दूसरी शिक्षा आम मध्यम वर्गों के लिए निजी स्कूलों वाली शिक्षा | हिन्दी प्रदेशों में जिसका माध्यम हिंगलिश होता है | इन विद्यालयों में अभिभावकों से जरुरी गैरजरूरी फीस ली जाती है और प्रायः अध्यापकों को थोड़े से वेतन पर रखा जाता है | परीक्षा के अंकों पर विशेष जोर देकर शिक्षण पद्यति को छात्रों के लिए नीरस उबाऊ और तनावपूर्ण बना दिया जाता है |

यही वो हिस्सा है जहाँ छात्रों की सबसे ज्यादा आत्महत्यायों की खबरे आती है | यही वो हिस्सा है जहाँ बच्चे एक -एक अंक के लिए मारामारी करते है | बच्चों के साथ -साथ अभिभावक भी भारी तनाव में रहते है | अंकों पर जोर के कारण ही पठन-पाठन दोनों अधिगम ( learning ) से दूर होते जाते है |समाज के उच्य वर्गों के लिए दून स्कूल जैसे स्कूल तो है ही | जहाँ हुक्मरानों के बच्चे पढ़ते है और उन्हें वैसी ही शिक्षा दी जाती है |

स्कूल व्यवस्था में Unschooling के क्या है मायने –

Unschooling की हिमायत करने वालों का मानना है , कि स्कूल व्यवस्था और फैक्ट्री की उत्पादन व्यवस्था में कोई आन्तर्य नहीं है | इसका अर्थ ये है कि वर्तमान स्कूलिंग काफी हद तक यांत्रिक है और इस कारण ये अधिगम ( Learning ) के उदेश्य को कभी पूरा नहीं कर सकती है |

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चाहे जो भी हो , लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता की स्कूलिंग पद्धति ने आधुनिक शिक्षा के प्रचार -प्रसार में अपनी सर्वप्रमुख भूमिका अदा की है | स्कूल पद्धति की ऐतिहासिक भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता | लेकिन जब तक ये गलाकाट प्रतिस्पर्धा और परीक्षा के अंक समाज में बेहतर जीवन और सफलता का मानक रहेंगे तब तक वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की सीमाएं और खामियां यूँ ही उजागर होती रहेंगी |

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