नंबी नारायणन: राकेट्री फिल्म का ट्रेलर लांच

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नंबी नारायणन

नंबी नारायणन -दी नंबी इफ़ेक्ट –

नंबी नारायणन पर बनी मूवी राकेट्री फिल्म का ट्रेलर लांच हुआ।लोग इस फिल्म की बहुत प्रशंसा कर रहे है।आर माधवन इसमें बहुत ही अच्छी एक्टिंग करते दिखाई दे रहे है।लेकिन हो सकता है कुछ लोगों इस फिल्म के टेलर भर देखने से ही फिल्म का स्क्रिप्ट का पता नहीं लग पा रहा है और वो ये भी नहीं जान पा रहे है की ये फिल्म किस पर आधारित है।इसलिए हमारी कोशिश ये है की आप को फिल्म के स्क्रिप्ट और कहानी किस पे आधारित है इसके बारे में बताया जाये।

इस फिल्म के टेलर में इतना तो पता लग ही है की इसमें देशभक्त और देशद्रोह के बारे में बात की गयी है।और ये फिल्म विज्ञानं पर आधारित फिल्म है। सबसे पहली फिल्म की बात इस फिल्म को आर माधवन ने ही लिखा और डायरेक्ट भी किया है।वर्घी मूलन पिक्चर्स के साथ आर माधवन ने इस फिल्म को प्रोडूस भी किया है।फिल्म का टेलर देखकर यही लग रहा है की फिल्म बहुत अच्छी बनी पड़ी है।

नंबी नारायणन पर आधारित फिल्म –

आये जानते है नंबी नारायणन के बारे में विस्तार से आखिर वो कौन है कहा से बिलोंग करते है। नंबी नारायणन एक भारतीय वैज्ञानिक और एयरोस्पेस इंजीनियर है 12 दिसंबर 1941 केरला के त्रिवंदपुरम में पैदा हुए थे। नांबी नारायणन एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे थे अपनी पांच बहनों के बाद जन्मे नारायणन माता-पिता की छठी संतान थे।उनके पिता नारियल के कारोबारी थे और मां घर पर रहकर बच्चों की देखभाल करती थीं।नारायणन मेधावी छात्र थे और अपनी कक्षा अव्वल आते थे।इसरो जाने से पहले उन्होंने इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री ली और कुछ समय तक चीनी की फ़ैक्टरी में काम किया वो बताते हैं, “एयरक्राफ़्ट मुझे हमेशा आकर्षित करते थे “।

नारायणन ने पहली बार 1966 में थिम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन थुम्बा,तिरुवनंतपुरम में इसरो के अध्यक्ष विक्रम साराभाई से मुलाकात की, जबकि उन्होंने वहां एक पेलोड इंटीग्रेटर के रूप में काम करने का मौका मिला।उस समय स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर (एसएसटीसी) के चेयरमैन, साराभाई ने केवल उच्च योग्य पेशेवरों की भर्ती की।पीछा करते हुए, नारायणन ने अपनी एमटेक डिग्री के लिए तिरुवनंतपुरम में इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया।

1969 में प्रिंसटन विश्वविद्यालय में प्रवेश किया-

इसे सीखने पर,साराभाई ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए छोड़ दिया अगर उन्होंने इसे किसी भी आइवी लीग विश्वविद्यालयों में बनाया।इसके बाद, नारायणन ने नासा फैलोशिप अर्जित की और 1969 में प्रिंसटन विश्वविद्यालय में प्रवेश किया।उन्होंने दस महीने के रिकॉर्ड में प्रोफेसर लुइगी क्रोको के तहत रासायनिक रॉकेट प्रणोदन में अपने मास्टर कार्यक्रम को पूरा किया। अमेरिका में नौकरी की पेशकश के बावजूद,नारायणन तरल प्रणोदन में विशेषज्ञता के साथ भारत लौट आए,जब भारतीय रॉकेट अभी भी ठोस प्रणोदकों पर निर्भर था।

नारायणन याद करते हैं, “जब मैंने इसरो में काम करना शुरू किया तब यह अपने शुरुआती दौर में था।सच कहें तो किसी तरह का रॉकेट सिस्टम विकसित करने की हमारी कोई योजना थी ही नहीं।अपने एयरक्राफ़्ट उड़ाने के लिए हम अमरीका और फ़्रांस के रॉकेट इस्तेमाल करने की योजना बना रहे थे ”

हालांकि ये प्लान बाद में बदल गया और नारायणन भारत के स्वदेशी रॉकेट बनाने के प्रोजेक्ट में अहम भूमिका निभाने लगे।साल 1994 तक उन्होंने एक वैज्ञानिक के तौर पर बड़ी मेहनत से काम किया तब तक,जब तक नवंबर 1994 में उनकी ज़िंदगी पूरी तरह उलट-पलट नहीं गई

जासूसी स्कैंडल में फसा एक वैज्ञानिक –

नारायणन की गिरफ़्तारी से एक महीने पहले केरल पुलिस ने मालदीव की एक महिला मरियम राशीदा को अपने वीज़ा में निर्धारित वक़्त से ज़्यादा समय तक भारत में रहने के आरोप में गिरफ़्तार किया था राशीदा की गिरफ़्तारी के कुछ महीनों बाद पुलिस ने मालदीव की एक बैंक कर्मचारी फ़ौज़िया हसन को गिरफ़्तार किया।इसके बाद एक बड़ा स्कैंडल सामने आया।पुलिस की जानकारी के आधार के अनुसार मालदीव की ये महिलाएं भारतीय रॉकेट से जुड़ी ‘गुप्त जानकारियां’ चुराकर पाकिस्तान को बेच रही हैं और इसमें इसरो के वैज्ञानिकों की मिलीभगत भी है।

अगले कुछ महीनों में नारायण की प्रतिष्ठा और इज़्ज़त जैसे टुकड़ों में बिखर गई. उन पर भारत के सरकारी गोपनीय क़ानून (ऑफ़िशियल सीक्रेट लॉ) के उल्लंघन और भ्रष्टाचार समेत अन्य कई मामले दर्ज किए गए।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायणन ने कहा है कि उन्हें जासूसी के झूठे मामले में फंसाने वाले षड्यंत्रकारी अलग-अलग उद्देश्यों वाले अलग-अलग लोग थे,लेकिन पीड़ित एक ही तरह के लोग थे सुप्रीम कोर्ट ने 1994 के जासूसी मामले में मानसिक यातना को लेकर नारायणन को 50 लाख रुपये का मुआवजा दिए जाने का निर्देश दिया था।शीर्ष अदालत ने मनगढ़ंत मामला बनाने और नारायणन की गिरफ्तारी तथा उन्हें भयानक प्रताड़ना और अत्यंत दुख पहुंचाए जाने को लेकर केरल पुलिस की भूमिका की जांच के लिए उच्चस्तरीय जांच का भी आदेश दिया था।

एक वैज्ञानिक पर यातना –

जांचकर्ता उन्हें पीटते थे और पीटने के बाद एक बिस्तर से बांध दिया करते थे। वो उन्हें 30 घंटे तक खड़े रहकर सवालों के जवाब देने पर मजबूर किया करते थे. उन्हें लाइ-डिटेक्टर टेस्ट लेने पर मजबूर किया जाता था। नारायणन को कड़ी सुरक्षा वाली जेल में रखा गया था। नारायणन ने पुलिस को बताया था कि रॉकेट की ख़ुफ़िया जानकारी ‘काग़ज के ज़रिए ट्रांसफ़र नहीं की जा सकती’ और उन्हें साफ़ तौर पर फंसाया जा रहा है |

उस समय भारत शक्तिशाली रॉकेट इंजन बनाने के लिए क्राइजेनिक टेक्नॉलजी को हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहा था और इसलिए जांचकर्ताओं ने नारायणन की बातों पर भरोसा नहीं किया।इस मामले में नारायणन को 50 दिन गिरफ़्तारी में गुजारने पड़े थे. वो एक महीने जेल में भी रहे जब भी उन्हें अदालत में सुनवाई के लिए ले जाया जाता,भीड़ चिल्ला-चिल्लाकरक उन्हें ‘गद्दार’ और ‘जासूस’ बुलाती थी।

क्लीन चिट और पद्म भूषण पुरस्कार मिलना –

साल 1996 में सीबीआई ने अपनी 104 पन्नों की रिपोर्ट जारी की और सभी अभियुक्तों को क्लीन चिट दे दी। सीबीआई ने कहा कि न तो इसरो से गोपनीय क़ागज चुराने के सबूत हैं और न ही पैसों के लेनदेन के इसरो की एक आंतरिक जांच में भी पता चला कि क्राइजेनिक इंजन से जुड़ा कोई काग़ज ग़ायब नहीं था।

इसके बाद नांबी नारायणन ने एक बार फिर इसरो में काम करना शुरू किया हालांकि अब वो बेंगलुरु में एक प्रशासनिक भूमिका निभा रहे थे हालांकि इन सबके बाद भी उनकी परेशानियों का अंत नहीं हु।सीबीआई के मामला बंद किए जाने के बावजूद, राज्य सरकार ने इसे दोबारा शुरू करने की कोशिश की और सुप्रीम कोर्ट गई।लेकिन साल 1998 में इसे पूरी तरह ख़ारिज कर दिया गया।

केरल सरकार पर मुक़दमा-

इन सबके बाद नारायणन ने उन्हें ग़लत तरीके से फंसाने के लिए केरल सरकार पर मुक़दमा कर दिया। मुआवज़े के तौर पर उन्हें 50 लाख रुपए दिए गए।अभी पिछले महीने केरल सरकार ने कहा कि वो ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारी और उत्पीड़न के मुआवज़े के तौर पर उन्हें एक करोड़ 30 लाख रुपए और देगी ।साल 2019 में नांबी नारायणन को भारत सरकार के प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से भी नवाजा गया।

नारायणन का कहना है कि मामले के पीछे निहित स्वार्थ थे क्योंकि मामले के चलते भारत के क्रायोजनिक इंजन का विकास करने में कम से कम 15 साल की देरी हुई। रॉकेट्री: द नंबी इफेक्ट नामक एक जीवनी फिल्म जिसका टेलर लॉंच हुआ है इस फिल्म में इन चीजें को दिखाया जायेगा।

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