राष्ट्र और राष्ट्रवाद

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राष्ट्रवाद

राष्ट्र और राष्ट्रवाद-

भारत -पाक तनाव के बीच युद्ध , राष्ट्र ,राष्ट्रवाद , देशभक्ति ,भारत माता जैसे शब्दों  की बहार आयी हुई है | आभासी दुनिया समेत , मीडिया , से सड़क तक , युद्ध तक का आह्वान करने वाले ‘ देशभक्तों ‘ और राष्ट्रवादियों की फ़ौज पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए घूम -घूम कर मांग भी कर रही थी | दूसरी ओर बालाकोट स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान में भी भारत की जुर्रत का मुँह तोड़ जवाब देने की बात की जा रही थी |इन सारी आवाजों ओर शोर -गुल के बीच शांति और स्थिरता बनाये रखने के मांग करने वालों आवाज या तो दब जा रही थी या तो उन्हें देशद्रोही बना दिया जाता था | युद्ध की मांग करने वाले अपने ड्रॉइंगरूम से या आभासी दुनिया से करने वाले ये भूल जाते है | की  आजादी के बाद सही माने में भारतवर्ष ने अभी तक छोटी -मोती लड़ाइयों ( 1971, १९६२,१९६५ )के इतर किसी युद्ध का सामना ही नहीं किया है | इन तीनो लड़ाइयों में हताहत की संख्या दोनों ओर से हजारों में रही है | ओर ईरान -इराक युद्ध ( १९८० -८८ ) के आठ वर्षों में जो भारत की अपेक्षा है बहुत छोटे मुल्क है | बीसियों लाख ज़्यदा सिपाही और नागरिक मारे गए थे | ये तो हुई तीसरी दुनिया के दो छोटे मुल्क की बीच युद्ध की बात और अभी दोनों विश्वयुद्ध (१९१४-१९१८) और (१९३९-१९४५) को छोड़ ही दीजिये जिसमे एक यूरोप की एक पूरी पीढ़ी प्रभावित हो गयी थी | लेकिन सवाल इससे भी गहरा है | सवाल ये है की राष्ट्र और राष्ट्रवाद के नाम पे ये त्रासदीपूर्ण युद्ध होते ही क्यों है ? ये राष्ट्र है क्या ? राष्ट्रवाद क्या है ? वगैरह |

संक्षेप में राष्ट्र की अवधारणा को और उसकी विकास प्रक्रिया को समझने के लिए मध्यकालीन दौर की पड़ताल करनी पड़ेगी | आज हम जिनको राष्ट्र (नेशन ) कहते है उनकी पहचान राष्ट्र राज्य ( नेशन स्टेट )के रूप में होती है |सम्पूर्ण मध्ययुग में राज्य या कहे’ सामंती राज्य ‘ तो थे लेकिन राष्ट्र राज्य नहीं थे | सामंती  राज्य राजस्व के सिद्धांत पे आधारित होता था | और राज्य की मशीनरी और सेना राजा के प्रति ही वफादार होती थी | उस दौर मुगलों की सत्ता अफगानिस्तान से लेकर कर्णाटक तक फैली हुई थी |राज्य मशीनरी और सेना मुग़ल सत्ता के प्रति वफादार थी न की राज्य के प्रति |
राष्ट्रवाद

इसी तरह पुरे यूरोप में आज जहाँ पचीस से ज़्यदा राष्ट्र राज्य है केवल तीन -चार राजवंश का शासन था | इन राजवंश के नाम थे – जार , होल्म्सबर्ग , बूरबॉन , तुर्की के खलीफा | इस प्रक्रिया ये नहीं भूलना चाहिए की ‘राज्य ‘ का (स्टेट) का अस्तित्व तो था ही लेकिन बस उसका रूप (स्ट्रक्चर ) सामंती था |वफ़ादारी और भक्ति भी सामंती थी |

पुनर्जागरण , प्रबोधन ( एनलाइटनमेंट ) से होते हुए आधुनिकता के विकास के साथ -साथ राज्यों का स्वरूप सामंती राज्य से राष्ट्र -राज्य के रूप में बदलने लगा | यूरोप में सामजिक क्रांतियों के( फ़्रांसीसी , इंग्लैंड , वेल्जियम वगैरह ) साथ -साथ औधोगिक क्रांति ने राज्य के रूप निर्णायक तौर पे सामंती राज्यों हटाकर राष्ट्र राज्यों का उद्विकास ( ऐवोलुशन) किया |

भारत समेत तीसरी दुनिया के देशों में राष्ट्रवाद का विकास उपनिवेशवाद ( कोलोनिअलिस्म ) के खिलाफ संघर्षों के दौरान हुआ है | अंग्रेजों के खिलाफ संघर्षों ने भारतीय जनता और इसकी वुद्धिजीवी आबादी को एक राष्ट्र रूप अपनी परिकल्पना ( हाइपोथिसिस ) को ठोस आधार दिया |

अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय जनता के संघर्ष ने भारतीय राष्ट्रवाद को उपनिवेश विरोधी और प्रगतशील चरित्र प्रदान किया | भारतीय राष्ट्रवाद का ये पहलु सकरात्मक था | भारतीय उपमहादीप की बड़ी आबादी स्वतंत्रता और बेहतर

और गरिमापूर्ण जीवन के लिए एक हुई और उन्होंने स्वतन्त्रा भी पायी |

इस सब के बाद भी एक सत्य से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता की , जाति(कास्ट ) , धर्म (रिलिजन ) , लैंगिक (जेंडर ) की तरह ही राष्ट्र भी एक सामजिक सच्चाई और पहचान( सोशल ट्रुथ एंड सोशल आइडेंटिटी ) है प्राकृतिक सच्चाई ( नेचुरल ट्रुथ ) नहीं | जिस तरह से देश के भीतर धार्मिक सम्प्रदावाद और जातिवाद ( कास्टसिस्म ) देश के आम जनता के एकता को तोड़ते है और हुक्मरानो को फायदा पहुंचाते है उसी तरह अंधराष्ट्रवाद ये देश या दुनिया की आम की एकता को तोड़ते है | और दुनिया के स्तर पे साम्राज्वादी ताकतों ( इम्पेरिअलिस्टिक फोर्सेज )को लाभ पहुंचाते है |

भारत -पाक के हालिया तनावों पर भारत -पाक के आम जनमानस को अपनी समझ और पक्षधरता दोनों मुल्कों की आम जनता के हितों के आधार पर बनानी होगी | अगर ऐसा नहीं होता है तो दोनों मुल्कों की आम जनता को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी और दोनों मुल्कों के हुक्मरानो का कुछ नहीं बिगड़ेगा| इसलिए इतिहास ने हमे अच्छी सीख दी है |

 

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